वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंसाहित्य-संस्कृति

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

साहित्य-संस्कृति

'साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज - भगत सिंह

अपराजिता•01 अगस्त 20268 मिनट पठन19 बार पढ़ा गया

लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्गचेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो।

भगत सिंह

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज - भगत सिंह

*****

[1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरू किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें समाप्त करने की जरूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किए।

जैसा कि पीछे कहा गया है, इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रांतिकारी आन्दोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के किरती में छपा ।]

भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म के होना ही दूसरे धर्म के कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मारकाट इसलिए नहीं की गई कि फलां आदमी दोषी है, वरन् इसलिए कि फलां आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है।

बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।

ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन 'धर्मों' ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई विरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी डण्डे लाठियां, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सिर फोड़ फोड़कर मर जाते हैं। बाकी बचे कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिए जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर 'धर्मजनों' पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर भी इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने पर आ जाता है।

जहां तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो 'समान राष्ट्रीयता' और 'स्वराज-स्वराज' के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठनेवालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, वैसे तो जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं, और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।

दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, वे अखबार वाले हैं।

पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था, आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटोव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक, जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो, बहुत कम हैं।

अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेलमिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता कौं नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि 'भारत का बनेगा क्या?'

जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है। कहां थे वे दिन कि स्वतन्त्रता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहां आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना मात्र बन गया है। बस यही तीसरा लाभहै, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। वही नौकरशाही जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गई, कल गई आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी है कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।

यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्रकारों ने ढेरों कुर्बानियां दीं। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गई थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया, जिससे आजकल के बहुत-से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गए। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल माक्र्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है। बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है, क्योंकि भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता।

लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और यही लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिए और जब तक सरकार बदल न जाए, चैन की सांस न लेनी चाहिए।

लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्गचेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।

जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहां भी ऐसी ही स्थितियां थीं, वहां भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहां श्रमिक-शासन हुआ है, वहां नक्शा ही बदल गया है। अब वहां कभी दंगे नहीं हुए। अब वहां सभी को 'इन्सान' समझा जाता है, 'धर्मजन' नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी, इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गई है और उनमें वर्गचेतना आ गई है इसलिए अब वहां से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आई।

इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन

कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत खुशी की सुनने में आई। वह यह कि वहां दंगों में ट्रेड यूनियनों के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्गचेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्गचेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।

यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं और उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से- हिन्दू-मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है और भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए, बल्कि तैयार-बर-तैयार हो यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, ताकि दंगे हों ही नहीं।

1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए, क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसीलिए गदर पार्टी-जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फांसियों पर चढ़े और हिन्दू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।

इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं, जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं।

यदि धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।

हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताए इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमें बचा लेंगे।

.

.

1 अगस्त,2026

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

'साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज - भगत सिंह

प्रकाशित: 01 अगस्त 2026 • 8 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
राष्ट्रीय

आपातकाल के समय भी ऐसा दृश्य नहीं देखा - पवित्र सरकार

'सरकार डर गई है, वे डगमगा गए हैं। इसलिए वे फासीवादी तरीके से लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाना चाहते हैं। उन्होंने लोगों के आंदोलन पर फासीवादी शैली में हमला बोला है। सरकार चाहती तो चर्चा के लिए बैठ सकती थी, बात कर सकती थी। कुछ माँगों को स्वीकार भी किया जा सकता था। लेकिन सरकार उस रास्ते पर नहीं गई। असल में उन्हें अपनी कुर्सी की चिंता है, इसलिए यह आक्रामकता है। पहले से ही ट्रेनें रद्द कर दी गईं, मेट्रो बंद कर दी गई, उड़ानों (एयरपोर्ट) से लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। मैंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा, आपातकाल के समय भी नहीं देखा।'

12 अक्टूबर 2026

राज्य

कलामंदिर में अनुमति रद्द, खुले आसमान के नीचे होगा नागरिक कन्वेंशन

किसी कार्यक्रम में सरकार विरोधी भावना हो सकती है, इस आशंका से पहले से दी गई अनुमति को रद्द करना लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। उनके अनुसार, इस प्रवृत्ति में फासीवादी मानसिकता झलकता है।

11 अक्टूबर 2026

राष्ट्रीय

दिल्‍ली प्रदर्शन 10 अक्टूबर : प्रदर्शन रोकने के लिए गृह सचिव ने की बैठक, हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को पीने का पानी भी नहीं दिया जा रहा।

SFI की नेत्री आइशी घोष ने एक वीडियो संदेश में बताया है कि उन्हें मुंडका पुलिस थाने में रखा गया है। उन्हें काफी समय से पीने का पानी नहीं दिया गया है। धरपकड़ के कारण सभी लोग घायल हैं। उन्होंने कहा कि सरकार यह सोचकर गलतफहमी में है कि पानी या खाना न देकर और लोगों को कैद करके वह इस विरोध को दबा सकती है।

10 अक्टूबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
साहित्य-संस्कृति

युग-प्रवर्तक भारतपथिक राममोहन राय :- विद्युत पाल

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने स्पष्टत: कहा कि राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का उद्घाटन किया, आज के विश्वजनीन सहयोग के जमाने की मानवता में हमारी दीक्षा उन्होंने ही सम्पन्न किया।

श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

साहित्य-संस्कृति

मध्ययुगीन भक्ति-आन्दोलन का एक पहलू - मुक्तिबोध

भक्ति-आन्दोलन का जनसाधारण पर जितना व्यापक प्रभाव हुआ उतना किसी अन्य आन्दोलन का नहीं। पहली बार शूद्रों ने अपने सन्त पैदा किये, अपना साहित्य और अपने गीत सृजित किये। कबीर, रैदास, नाभा सिपी, सेना नाई, आदि-आदि महापुरुषों ने ईश्वर के नाम पर जातिवाद के विरुद्ध आवाज बुलन्द की। समाज के न्यस्त स्वार्थवादी वर्ग के विरुद्ध नया विचारवाद अवश्यम्भावी था , वह हुआ।

अपराजिता • 30 जुलाई 2026

साहित्य-संस्कृति

लड़कियां गाली दे रही हैं! ~ हूबनाथ

जो लोग/

गाली से भी बदतर हैं/

उन्हें शिकायत है/

कि लड़कियां/

गाली दे रही हैं।

दरअसल/

लड़कियां/

वह सब कुछ/

सूद समेत लौटा रही हैं।

राजीव कुमार पाण्डेय • 29 अगस्त 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement