इस आंदोलन ने लोगों के अंदर एक नई उम्मीद को फिर से ज़िंदा किया। भरोसा लौटाया, जो पिछले कुछ सालों में कमज़ोर पड़ता जा रहा था। लोगों ने एक बार फिर महसूस किया कि जब आम नागरिक अपने घरों से निकलकर सड़कों पर आते हैं, जब वे अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करते हैं, तब बड़े से बड़े फासीवादी ताकत को भी झुकना पड़ता है।
जंतर मंतर के 40 दिन: जब छात्रों ने सत्ता को झुकाया
__शरणया वर्मा

(जंतर-मंतर आंदोलन से वामपंथी छात्र संगठन AISA और SFI से नेहा वोरा और शरणया वर्मा को अखिल भारतीय पहचान मिली है। हिमाचल प्रदेश के शिमला जिला के ठियोग तहसील की शरणया वर्मा के नेतृत्व में SFI दिल्ली की सांस्कृतिक टीम ने आंदोलन को व्यापक बनाया है।यह सांस्कृतिक टीम 80 के दशक में "जन नाट्य मंच" और "परचम "की याद दिलाती है।)
एक हफ़्ता पहले, नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ चला 40 दिनों का छात्र आंदोलन एक ऐतिहासिक जीत के साथ समाप्त हुआ। इस आंदोलन ने केंद्र सरकार को झुकने पर मजबूर किया और अंत में धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा। आंदोलन के समाप्त होने के बाद जो लोग आंदोलन में शामिल थे उनसे यह सवाल कई बार पूछा जाता है कि जंतर मंतर के वे 40 दिन कैसे थे? और जब मुझसे पूछते हैं तो हर बार उन यादों के टुकड़ों को बटोरते हुए एक नई तस्वीर बन जाती है। मगर वो सारी तस्वीरें एक नए समाज की उम्मीद ही दिखाती है।

मैं और मेरे SFI के साथी तो कई सालों से शिक्षा पर चल रहे हमलो का विरोध कर रहे थे। नई शिक्षा नीति 2020 के विरोध से लेकर लगातार हो रहे पेपर लीक तक, हम लंबे समय से सड़कों पर थे। यह आंदोलन उन निरंतर कोशिशों का ही नतीजा था। सरकार का हमला बढ़ता गया, हमारा संघर्ष और तेज़ी से बढ़ता गया और फिर एक दिन इन्हीं मुद्दों को लेकर जंतर -मंतर पर सैकड़ों छात्र इकट्ठा हो गए।

सरकार ने जंतर-मंतर को एक तरीके से सरकारी प्रदर्शन स्थल घोषित कर रखा था लेकिन इस आंदोलन में वो सिर्फ एक प्रदर्शन स्थल नहीं रहा। वह एक ऐसी जगह बन गया जहाँ हर वो इंसान अपनी बात कहने आया था जिसे इस सरकार की शिक्षा व्यवस्था ने कहीं-न-कहीं चोट पहुँचाई है। वहाँ NEET के छात्र थे, और अन्य लीक हुए पेपरों के छात्र थे, उनके परिवार थे, और उन बच्चों के भी परिवार थे जिनको इस शिक्षा वयवस्था ने क़त्ल कर दिया। उन सबकी बातें अलग थी, उन सबके अपनी बात कहने के तरीके अलग थे ।लेकिन मुद्दा सिर्फ एक कि शिक्षा व्यवस्था के पतन की सरकार ज़िम्मेदारी ले। मतलब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।
इस आंदोलन ने हमें दिखाया कि नफ़रत की राजनीति को हराना कितना आसान है। जंतर मंतर पर धर्म, जाति, भाषा और लिंग की दीवारें पीछे छूट गई थीं। जिन बँटवारों को भाजपा और आरएसएस अपनी सांप्रदायिक और मनुवादी राजनीति के ज़रिए मज़बूत करना चाहते हैं, जनता ने उन्हें वहीं ध्वस्त कर दिया। लोग नफ़रत की नहीं, बराबरी और शिक्षा की राजनीति कर रहे थे। वे बता रहे थे कि इस देश को बाँटने से नहीं, जोड़ने से बदला जा सकता है।
इस आंदोलन की मज़बूती, छात्र संगठनों (जैसे SFI) की संगठनात्मक ताकत, युवाओं का गुस्सा, सब सामने आया 20 जुलाई के दिन। जब दिल्ली पुलिस ने सरकार के इशारे पर छात्रों पर खुलकर दमन किया। दाँए से ,बाएँ से लाठियाँ बरसाई गयी। किसी पुलिस वाले ने ऊपर से घसीटा तो किसी पुलिस वाले ने नीचे से। ज़मीन पर भगदड़, साँस लेने में दिक्कत, और आसमान में उड़ती हुए टियर गैस के गोले। इस सबके बावजूद छात्र टस से मस नहीं हुए। पुलिस ने लाठी मार -मार कर सबको जंतर मंतर से भगा दिया, टेंट और मंच तोड़ दिया। लेकिन छात्रों को जहाँ जगह मिली वे वहीं पर बैठ गए। उनका बस यही कहना था कि इस्तीफा लिए बगैर नहीं जायेंगे। जैसे ही पुलिस शांत हुई, रातों रात छात्रों ने साफ़ सफाई करके अपना प्रदर्शन फिर खड़ा कर दिया।
जो सत्ता जनता की आवाज़ को लाठी से दबाने की कोशिश करती है, वही सत्ता अंत में जनता के सामने झुकने पर मजबूर होती है। इस सरकार का अहंकार भी आखिरकार लोगों की एकजुटता के सामने टिक नहीं सका। जंतर-मंतर से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में उठी आवाज़ों ने मिलकर इस तरीके से दबाव बनाया कि सरकार को पीछे हटना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा। यह सिर्फ़ एक मंत्री का इस्तीफ़ा नहीं था, बल्कि इस बात का प्रमाण था कि लोकतंत्र में जनता की संगठित ताक़त किसी भी सत्ता से बड़ी होती है।
इस आंदोलन ने लोगों के अंदर एक नई उम्मीद को फिर से ज़िंदा किया। भरोसा लौटाया, जो पिछले कुछ सालों में कमज़ोर पड़ता जा रहा था। लोगों ने एक बार फिर महसूस किया कि जब आम नागरिक अपने घरों से निकलकर सड़कों पर आते हैं, जब वे अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करते हैं, तब बड़े से बड़े फासीवादी ताकत को भी झुकना पड़ता है।
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[ लेखिका डॉ. आंबेडकर विश्वविद्यालय की स्टूडेंट काउंसिल की चुनी हुई भूतपूर्व वित्त सचिव व वर्तमान में दिल्ली SFI की नेता हैं। ]
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