जब आरएसएस ने तिरंगे झंडे के बहिष्कार का आह्वान किया था, तब कम्युनिस्ट नेता ए. के. गोपालन सहित ब्रिटिश जेल वेल्लोर में बंद कई कम्युनिस्ट नेताओं ने जेल में ही स्वतंत्र देश का ध्वज फहराकर राष्ट्रगान गाया था।
जन समाचार मंच
जब आरएसएस ने तिरंगे झंडे के बहिष्कार का आह्वान किया था, तब कम्युनिस्ट नेता ए. के. गोपालन सहित ब्रिटिश जेल वेल्लोर में बंद कई कम्युनिस्ट नेताओं ने जेल में ही स्वतंत्र देश का ध्वज फहराकर राष्ट्रगान गाया था।
शमीक लाहिड़ी

स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक एक दिन पहले यानी 14 अगस्त, 1947 को आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र 'Organiser' के पन्नों पर 'Whither' शीर्षक वाले संपादकीय और लेख में लिखा गया था -
"The people who have come to power by the kick of fate may give in our hands the Tricolour but it will never be respected and owned by Hindus. The word three is in itself an evil, and a flag having three colours will certainly produce a very bad psychological effect and is injurious to a country."
जिसका हिंदी अनुवाद है - "भाग्य के भरोसे जो लोग सत्ता में आए हैं, वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगा थमा दें, लेकिन हिंदू इसका कभी सम्मान नहीं करेंगे और न ही इसे अपना मानेंगे। 'तीन' शब्द अपने आप में ही अशुभ है, और तीन रंगों वाला झंडा निश्चित रूप से बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा जो देश के लिए हानिकारक है।"
आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर के लिखे लेखों और भाषणों के संकलन 'Bunch of Thoughts' पुस्तक, जो 1966 में प्रकाशित हुई थी, उसमें विशेष रूप से 'Drifting and Drifting' शीर्षक अध्याय में राष्ट्रीय ध्वज को लेकर विस्तृत चर्चा मिलती है। वहाँ उन्होंने लिखा था -
"Our leaders have set up a new flag for our country. Why did they do so? It is just a case of drifting and imitating... Ours is an ancient and great nation with a glorious past. Then, had we no flag of our own? Had we no national emblem at all these thousands of years? Undoubtedly we had. Then why this utter void, this utter vacuum in our minds?"
हिंदी में इसका अर्थ है - "हमारे नेताओं ने हमारे देश के लिए एक नया झंडा तय किया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह केवल लक्ष्यहीन होकर बहने और अंधी नकल करने का एक उदाहरण है... हमारा यह राष्ट्र एक प्राचीन और महान राष्ट्र है, जिसका एक गौरवशाली अतीत रहा है। इसके बावजूद, क्या हमारा अपना कोई झंडा नहीं था? क्या इतने हजारों वर्षों में हमारा कोई राष्ट्रीय प्रतीक नहीं था? निस्संदेह हमारा था। तो फिर हमारे मन में यह परम शून्यता, यह परम खालीपन क्यों है?"
ये लोग अब राष्ट्रीय ध्वज को लेकर 'हर घर तिरंगा' (Har Ghar Tiranga) अभियान चलाएंगे!!!
जब आरएसएस ने तिरंगे झंडे के बहिष्कार का आह्वान किया था, तब कम्युनिस्ट नेता ए. के. गोपालन सहित ब्रिटिश जेल वेल्लोर में बंद कई कम्युनिस्ट नेताओं ने जेल में ही स्वतंत्र देश का ध्वज फहराकर राष्ट्रगान गाया था।
प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता एन. शंकरैया और पी. राममूर्ति मदुरै षड्यंत्र मामले में लगभग 10 महीने तक जेल में बंद थे। स्वतंत्रता की ठीक पूर्व संध्या यानी 14 अगस्त 1947 की रात को मदुरै सेंट्रल जेल से रिहा होने के बाद, उन्होंने 15 अगस्त की सुबह शहर के तिलक मैदान में भारी जनसमूह के सामने स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया और स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
अविभाजित बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेता बंकिम मुखर्जी और किसान व मजदूर आंदोलन के प्रमुख आयोजकों में से एक डॉ. रणेन सेन स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक पहले के दिनों में दमदम सेंट्रल जेल में राजनीतिक कैदी के रूप में कैद थे। 15 अगस्त 1947 की सुबह जेल के भीतर की कड़ी निगरानी और अधिकारियों की बाधाओं के बावजूद, उन्होंने राजनीतिक बंदियों को संगठित करके दमदम जेल परिसर में राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) फहराया और बंदियों ने समवेत स्वर में राष्ट्रगान गाया।
चटगाँव युवा विद्रोह के वीर क्रांतिकारी गणेश घोष और युवा क्रांतिकारी सुबोध राय, जो बाद में कम्युनिस्ट पार्टी की मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े, हिजली जेल (वर्तमान में आईआईटी खड़गपुर परिसर) में लंबे वर्षों तक कैद रहे। पराधीनता के समय से ही कम्युनिस्ट और वामपंथी बंदियों पर होने वाले अत्याचारों के प्रतीक इस बंदी गृह में ही 15 अगस्त की सुबह उन्होंने बंदियों को एकत्र करके प्रशासनिक परिसर के सामने स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
कम्युनिस्ट आंदोलन के अग्रणी सैद्धांतिक नेता भवानी सेन और भारत की संविधान सभा के एकमात्र कम्युनिस्ट सदस्य सोमनाथ लाहिड़ी तत्कालीन राजनीतिक आंदोलन के सिलसिले में जेल में बंद और नजरबंद थे। 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस की सुबह प्रेसीडेंसी जेल के राजनीतिक बंदी वार्ड में जेल की दीवार से घिरे प्रांगण में ही उन्होंने अन्य राजनीतिक कैदियों के साथ मिलकर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के कार्यक्रम का नेतृत्व किया।
प्रसिद्ध लोकगायक और कम्युनिस्ट नेता निबारण पंडित देश विभाजन के ठीक पहले राजशाही जेल में बंद थे। देश के विभाजन और जेल की चरम अनिश्चितता के बीच भी उन्होंने जेल के भीतर ही राजनीतिक बंदियों को साथ लेकर तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज फहराया और स्वतंत्रता के समर्थन में स्व-रचित जनगीत प्रस्तुत किया।
चरम-दक्षिणपंथी आरएसएस एक असत्य प्रचार करता है कि मुख्यमंत्री रहते हुए ज्योति बसु राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराते थे।
जबकि भारत के संविधान और राज्य प्रशासनिक परंपरा के अनुसार 15 अगस्त को राज्यों में मुख्यमंत्री ही मुख्य सरकारी समारोह में राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए ज्योति बसु ने लगातार दो दशकों से भी अधिक समय तक हर साल 15 अगस्त को कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग और अन्य प्रमुख सरकारी समारोहों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया है।
इन सभी बातों के प्रमाण इतिहास में सुरक्षित हैं।
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(लेखक सीपीआई (एम) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य और बांग्ला दैनिक 'गणशक्ति' के संपादक हैं)
10 अगस्त,2026
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प्रकाशित: 10 अगस्त 2026 • 5 मिनट पठन

'सरकार डर गई है, वे डगमगा गए हैं। इसलिए वे फासीवादी तरीके से लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाना चाहते हैं। उन्होंने लोगों के आंदोलन पर फासीवादी शैली में हमला बोला है। सरकार चाहती तो चर्चा के लिए बैठ सकती थी, बात कर सकती थी। कुछ माँगों को स्वीकार भी किया जा सकता था। लेकिन सरकार उस रास्ते पर नहीं गई। असल में उन्हें अपनी कुर्सी की चिंता है, इसलिए यह आक्रामकता है। पहले से ही ट्रेनें रद्द कर दी गईं, मेट्रो बंद कर दी गई, उड़ानों (एयरपोर्ट) से लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। मैंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा, आपातकाल के समय भी नहीं देखा।'
12 अक्टूबर 2026

किसी कार्यक्रम में सरकार विरोधी भावना हो सकती है, इस आशंका से पहले से दी गई अनुमति को रद्द करना लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। उनके अनुसार, इस प्रवृत्ति में फासीवादी मानसिकता झलकता है।
11 अक्टूबर 2026

SFI की नेत्री आइशी घोष ने एक वीडियो संदेश में बताया है कि उन्हें मुंडका पुलिस थाने में रखा गया है। उन्हें काफी समय से पीने का पानी नहीं दिया गया है। धरपकड़ के कारण सभी लोग घायल हैं। उन्होंने कहा कि सरकार यह सोचकर गलतफहमी में है कि पानी या खाना न देकर और लोगों को कैद करके वह इस विरोध को दबा सकती है।
10 अक्टूबर 2026

हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।
केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।
केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026
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