वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंब्लॉग

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

ब्लॉग

आज़ादी का अर्थ!

राजीव कुमार पाण्डेय•16 अगस्त 20263 मिनट पठन12 बार पढ़ा गया

अब तुम आज़ाद हो

तुम्हें पूरी दुनिया को

रास्ता दिखाना है

आज़ादी का अर्थ!

वे मुट्ठी भर थे

पर ज़ोर से चिल्लाए

एकस्वर में चिल्लाए

अरे!

इसके माथे पर तो

तिलक था

किसने मिटा दिया

कितना पवित्र निशान था

किसने हटा दिया

अरे!

इसके तो हाथ

बंधे हुए हैं

(जबकि हाथ प्रार्थना में

जुड़े हुए थे)

अरे!

इसकी आंखें तो

मुंदी हुई है

(वह ध्यानमग्न था)

अरे!

इसके तो पैर

टूटे हुए हैं

(पैर चलने के लिए

उठे हुए थे)

देखो तो

कितना कमज़ोर

हो गया है

(वे देह देख रहे थे

आत्मबल नहीं)

अब इसका क्या होगा

यह तो कुछ दिनों में

मर ही जाएगा

वे दिन-रात

चिल्लाते रहे

थोड़े -थोड़े

तमाशबीन जुटने लगे

फिर वे सभी

मिलकर चिल्लाने लगे

उनके गुरु ने कहा था

चिल्ला चिल्लाकर

बोला गया

सफ़ेद झूठ भी

रंगीन सच बन जाता है

गुरु कभी ग़लत नहीं होता

भीड़ बढ़ती गई

लोग चिल्लाते रहे

शोर मचाते रहे

और एक दिन

उसे

इनके हवाले

कर दिया गया

इन्होंने

सबसे पहले

उसकी पलकें नोच कर

दोनों आंखें

फोड़ दीं

प्रार्थना में जुड़े

हाथों को

कुहनी पर से

काट दिया

सिर तोड़ कर

भीतर से दिमाग़

निकाल लिया

सारे फ़साद की जड़

यह दिमाग़ ही तो था

पूरे चेहरे पर

रंग-रोगन सजाकर

मुंह से भी बड़ा

तिलक लगा दिया

घुटने तक

दोनों पैर काट दिए

वह चिल्लाया नहीं

क्योंकि

ज़बान पहले ही

खींच ली गई थी

गले में लटका दिया गया

पांच किलो अनाज का

फटा झोला

और

उससे कहा गया

देखो!

तुम्हें उन सबके साथ

तेज़ दौड़ कर

सबसे आगे जाना है

इतना कहकर

उसे वहीं छोड़कर

वे मुट्ठी भर लोग

अपने लोगों के साथ

उस ओर दौड़ पड़े

जहां से

सूरज निकलने की

संभावना थी

एक ऊंचे पहाड़ पर

चढ़कर

वे ज़ोरों से चिल्लाने लगे

एक स्वर में

उसकी प्रशंसा के

गीत गाने लगे

वह

कटे हाथों और पैरों से

दिशाहीन

घिसट घिसट कर

आगे बढ़ने की

कोशिश करने लगा

जगह जगह से

बदन छिल गया

लहू सूखकर

काले पड़ गए

उसे कुछ सूझ नहीं रहा

बस

वह उस आवाज़ की

दिशा में

रेंगता जा रहा था

दूर ऊंचे पहाड़ों से

एक स्वर में

चीख़ती आवाज़ें आ रही थीं

शाबास!

अब तुम आज़ाद हो

तुम्हें पूरी दुनिया को

रास्ता दिखाना है

अपने स्वर्णिम अतीत

को याद करो

बीते वैभव को

याद करो

और दौड़ पड़ो

पूरी दुनिया की

निगाह तुम पर है

ऐ हमारी आशा के दीप!

वहां तक तो आओ

जहां हम खड़े हैं

आ जाओ !

हम तुम्हें बताएंगे

आज़ादी का सही अर्थ!

- हूबनाथ

[लेखक परिचय: लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

आज़ादी का अर्थ!

प्रकाशित: 16 अगस्त 2026 • 3 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
साहित्य-संस्कृति

प्रश्नोपनिषद - 2: हूबनाथ

प्रश्न करना /

राजद्रोह /

आंदोलन करना /

देशद्रोह /

हक़ मांगना /

राष्ट्रद्रोह /

बना दिया ।

इन सबके बावजूद /

लोग डर नहीं रहे /

छोटे-छोटे बच्चे /

खिलाफत को /

उतारू हैं ।

16 सितंबर 2026

राज्य

गड़वेता-शालबनी के 7 पार्टी दफ्तरों में बीजेपी का उपद्रव, लेनिन की मूर्ति तोड़ी गई

मंगलवार दोपहर गड़वेता के अमलागोड़ा तिराहे पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने हथौड़े से लेनिन की मूर्ति तोड़ दी। उससे पहले शनिवार रात शालबनी में हमला हुआ था। शालबनी बाजार के पास सीपीआई(एम) का पुराना कार्यालय 'तुलसी भवन' है। सोमवार आधी रात को सबल और बड़े सीमेंट के खंभों से गेट तोड़कर बीजेपी कार्यकर्ता अंदर घुसे। उन्होंने टीवी, कंप्यूटर, रसोई गैस, पंखे समेत अन्य सामान लूट लिया। इसके बाद तोड़फोड़ करके आग लगा दी।

16 सितंबर 2026

साहित्य-संस्कृति

माफीनामा: हूबनाथ

हम तो /

नारी शक्ति के समक्ष /

नतमस्तक हैं ।

हम सभी /

एक स्त्री से ही तो /

जनमे हैं ।

उसी के संरक्षण में /

हमारा स्वर्णिम /

बालपन बीता है ।

12 सितंबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
ब्लॉग

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

गीता या ग्रंथ साहिब नहीं, फांसी से ठीक पहले वे (भगत सिंह) लेनिन को पढ़ रहे थे। तो क्या भगत सिंह की देशभक्ति में कोई कमी थी? इतिहासकार बिपन चंद्र लिखते हैं कि विरोध में बॉम्बे के सभी सूती मिलों और रेल श्रमिकों की पूर्ण हड़ताल से शहर थम गया। सेना बुलाई गई। सड़कों पर 16 श्रमिक शहीद हुए और 50 घायल हुए। भारत में श्रमिकों की हड़ताल देखकर 'इन्फ्लेमेबल मटेरियल इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स' लेख में व्लादिमीर लेनिन ने लिखा: 'इस बीच भारत में भी सर्वहारा जनता जागरूक राजनीतिक जनसंघर्ष खड़ा कर रही है। और इसके परिणामस्वरूप भारत में रूसी शैली के ब्रिटिश शासन की स्थिति भी दयनीय हो गई है।'

मोहम्मद सलीम • 25 अप्रैल 2026

ब्लॉग

नीट महाघोटाला: क्या 'सस्ते' चरित्र और 'महंगे' पँचों की बलि चढ़ेगा देश का भविष्य? - केशव भट्टड़

नीट महाघोटाला: 'डार्लिंग' से 'डेथ' तक का मंजर

"22 लाख से अधिक छात्रों की आँखों के सपने, होनहार युवाओं की जलती चिता, और पर्चे के बदले अस्मत माँगते 'गुरु' का घिनौना चेहरा— यह है उस परीक्षा का सच, जिसे देश 'डॉक्टर' बनाने के लिए करवाता है। जब तंत्र की लापरवाही और धन की हवस हद पार कर जाए,तो शिक्षा का मंदिर श्मशान और व्यापार की मंडी बन जाता है।

आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

ब्लॉग

अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement