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रतनलाल ब्राम्हण ने मार्क्सवाद को किताबों में नहीं,बल्कि जीवन में पढ़ा, संघर्षों में समझा और जीवन में उतारा - समन पाठक

अपराजिता•16 अगस्त 20263 मिनट पठन21 बार पढ़ा गया

कम्युनिस्ट पार्टी ने उस आग को बुझाया नहीं—उसे सही दिशा दी। अनुशासन और राजनीतिक मार्गदर्शन ने धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व में बड़ा परिवर्तन लाया। उनकी उग्रता में परिपक्वता आई, व्यवहार में विनम्रता आई, लेकिन अन्याय के खिलाफ उनका अडिग रुख और भी मजबूत होता गया। अब वे केवल विद्रोही बाजे नहीं रहे—एक धुरंधर कम्युनिस्ट बन गए।

" रतनलाल ब्राम्हण ने मार्क्सवाद को किताबों में नहीं,बल्कि जीवन में पढ़ा, संघर्षों में समझा और जीवन में उतारा "

समन पाठक

माइला बाजे ‘मेनिफेस्टो’ पढ़कर कम्युनिस्ट नहीं बने थे, बल्कि जीवन के कठिन अनुभवों ने उन्हें एक दृढ़ कम्युनिस्ट बनाया।

रतनलाल ब्राह्मण उनका शिष्ट नाम था, लेकिन सभी उन्हें “माइला बाजे” के नाम से ही जानते थे।

(नेपाली में ‘माइला’ का अर्थ मझौला भाई होता है। ‘बाजे’ शब्द ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक संबोधित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।)

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत के साथ उन्होंने इस संसार में कदम रखा—16 अगस्त 1900 को। जीवनभर उन्होंने दार्जिलिंग की ठंडी पहाड़ी ढलानों और दुर्गम इलाकों को अपने संघर्ष की तपिश से गर्म रखा। पहाड़ के सीधे-सादे, गरीब और वंचित लोगों के घने अँधेरे जीवन में उन्होंने लाल मशाल जलाई और उन्हें मुक्ति का रास्ता दिखाया।

चालीस के दशक में ब्रिटिश हुकूमत गरीब जनता को गुलामी और पशुतुल्य जीवन जीने के लिए मजबूर कर रही थी। उसी जनता को संगठित करने की जिम्मेदारी लेकर कम्युनिस्ट पार्टी के एक कर्मठ कार्यकर्ता सुशील चटर्जी दार्जिलिंग आए।

लेकिन सुशील चटर्जी पहाड़ की कंदराओं, दुर्गम इलाकों और यहाँ के जनजीवन की गहराई को तुरंत समझ नहीं सके। लगभग तीन वर्षों के बाद ही वे माइला बाजे को सही अर्थों में समझ पाए। सुशील चटर्जी ने उन्हें बहुत कुछ बताया, सिखाया और समझाया। लेकिन एक बात बाजे के मन में गहराई से बैठ गई—अपमान और अन्याय सहकर चुपचाप नहीं बैठना चाहिए, बल्कि उसके खिलाफ संघर्ष करना चाहिए। इसी चेतना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। सन् 1943 में माइला बाजे कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गए।

उस समय तक दार्जिलिंग में वे एक मावली और बदमाश, लेकिन गरीबों के लिए रॉबिन हुड जैसे व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। अन्याय देखते तो चुप नहीं बैठते थे। उनका स्वभाव मानो आग की बहती हुई नदी था।

लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने उस आग को बुझाया नहीं—उसे सही दिशा दी। अनुशासन और राजनीतिक मार्गदर्शन ने धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व में बड़ा परिवर्तन लाया। उनकी उग्रता में परिपक्वता आई, व्यवहार में विनम्रता आई, लेकिन अन्याय के खिलाफ उनका अडिग रुख और भी मजबूत होता गया। अब वे केवल विद्रोही बाजे नहीं रहे—एक धुरंधर कम्युनिस्ट बन गए।

चाय-बागानों के श्रमिकों को संगठित करते हुए उन्होंने उनके अधिकार और सम्मान के लिए निरंतर और दृढ़ संघर्ष किया। पश्चिम बंगाल के प्रारंभिक तीन वामपंथी विधायकों में कॉमरेड रतनलाल ब्राह्मण भी एक थे। इसके बाद सन् 1970 में वे लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।

उनके विचारों और व्यक्तित्व पर महात्मा गांधी, धरणीधर कोइराला, राहुल सांकृत्यायन और महादेव साहा आदि का गहरा प्रभाव था। राहुल सांकृत्यायन से उन्होंने इतिहास, धर्म, समाज और साम्यवाद के बारे में ज्ञान प्राप्त किया। जेल जीवन के दौरान महादेव साहा से उन्होंने मानव समाज के विकास और साम्यवाद के सैद्धांतिक पक्ष की शिक्षा हासिल की।

ज्योति बसु उनके अभिन्न मित्र थे।

मार्क्सवाद की किताबें रात-दिन पढ़ने वाले लोग थे, ‘मेनिफेस्टो’ सैकड़ों बार पढ़ने वाले भी थे। लेकिन बाजे ने मार्क्सवाद को किताबों में नहीं, बल्कि जीवन में पढ़ा; संघर्षों में समझा और व्यवहार में उतारा।

उन्होंने लगभग नौ दशक का जीवन जिया—और वह भी एक सक्रिय कम्युनिस्ट के रूप में। पार्टी के 13 वें पार्टी अधिवेशन (केरल) से लौटने के क्रम में उनका निधन हुआ। उनका पूरा जीवन जनता, संघर्ष और कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रति समर्पित रहा।

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(लेखक CPIM की केंद्रीय कमेटी के सदस्य और दार्जिलिंग जिला के सचिव हैं)

16 अगस्त,2026

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रतनलाल ब्राम्हण ने मार्क्सवाद को किताबों में नहीं,बल्कि जीवन में पढ़ा, संघर्षों में समझा और जीवन में उतारा - समन पाठक

प्रकाशित: 16 अगस्त 2026 • 3 मिनट पठन

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