केवल शौचालय बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि वहाँ पानी का नल/कनेक्शन होना चाहिए। शौचालयों का निर्माण और रखरखाव इस प्रकार किया जाना चाहिए कि छात्राओं की गोपनीयता और गरिमा बनी रहे। साथ ही दिव्यांग विद्यार्थियों की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके अलावा, स्कूलों में साबुन और पानी से हाथ धोने की व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए थे।
साथ ही, लड़कियों को मुफ्त में ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल (Oxo-biodegradable) सेनेटरी नैपकिन और स्कूलों में आपातकालीन आपूर्ति सहित मासिक धर्म संबंधी आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए थे। शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि मासिक धर्म लड़कियों के स्कूल आने में कोई बाधा न बने।
98 हजार से अधिक स्कूलों में
लड़कियों के लिए शौचालय नहीं,
सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

नई दिल्ली।देश के सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए उपयोग योग्य शौचालयों की कमी कितनी गंभीर है, यह बात सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में सामने आई है। नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने सोमवार को शीर्ष अदालत को बताया कि देश के 98 हजार से अधिक स्कूलों में अभी भी लड़कियों के लिए उपयोग योग्य शौचालय नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए याचिका को उसी पीठ के पास भेजने का निर्देश दिया है, जिसने इस साल के अंत में मासिक धर्म स्वच्छता को जीवन और शिक्षा के मौलिक अधिकार से जोड़ा था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई शुरू हुई। दीपक कंसल नाम के व्यक्ति ने केंद्र, विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खिलाफ यह जनहित याचिका दायर की है। उनके वकील ने अदालत का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा, "नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में स्कूलों में लड़कियों के लिए उपयोग योग्य शौचालय अभी भी मौजूद नहीं हैं।"
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस विषय से सम्बंधित एक विस्तृत फैसला पहले ही दे चुका है। उन्होंने वकील से उस फैसले के निर्देशों की समीक्षा करने और वर्तमान आवेदन पर अगली कार्रवाई के बारे में सूचित करने को कहा। इसके बाद पीठ ने कहा कि 30 जनवरी को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ द्वारा दिए गए फैसले में इस सम्बंध में कई महत्वपूर्ण निर्देश शामिल थे। इसलिए, इस नई याचिका की सुनवाई भी उसी पीठ के समक्ष होना उचित है।
शीर्ष अदालत ने दोहराया कि याचिका में उठाए गए मुद्दे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जनवरी के उस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मासिक धर्म स्वच्छता सुनिश्चित करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का ही एक हिस्सा है। इसके साथ ही शिक्षा के अधिकार को इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि मासिक धर्म जैसी स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया के कारण किसी भी छात्रा को स्कूल जाना न छोड़ना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी कि शिक्षा केवल स्कूल में प्रवेश लेने का औपचारिक अधिकार नहीं है, बल्कि शिक्षा प्राप्त करने और उसे पूरा करने के लिए आवश्यक वातावरण सुनिश्चित करना भी राज्य का कर्तव्य है। इसी रुख के तहत शीर्ष अदालत ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और उपयोग योग्य शौचालय सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने स्पष्ट किया था कि केवल शौचालय बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि वहाँ पानी का नल/कनेक्शन होना चाहिए। शौचालयों का निर्माण और रखरखाव इस प्रकार किया जाना चाहिए कि छात्राओं की गोपनीयता और गरिमा बनी रहे। साथ ही दिव्यांग विद्यार्थियों की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके अलावा, स्कूलों में साबुन और पानी से हाथ धोने की व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए थे।
साथ ही, लड़कियों को मुफ्त में ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल (Oxo-biodegradable) सेनेटरी नैपकिन और स्कूलों में आपातकालीन आपूर्ति सहित मासिक धर्म संबंधी आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए थे। शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि मासिक धर्म लड़कियों के स्कूल आने में कोई बाधा न बने।
लेकिन उस फैसले के महीनों बाद भी स्थिति में सुधार न होने पर सरकार की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अदालत में पेश किए गए नीति आयोग के आंकड़े देश के स्कूली शिक्षा के बुनियादी ढांचे और विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा में लम्बे समय से चले आ रहे भेदभाव की तस्वीर पेश करते हैं। इस साल मई में जारी नीति आयोग की रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में 18,592 सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए उपयोग योग्य शौचालय नहीं थे, जबकि इसी अवधि के दौरान 61,540 स्कूलों में कोई भी उपयोग योग्य शौचालय नहीं था।
.
.
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...