देश में 15 से 25 वर्ष के युवाओं में से लगभग 40 प्रतिशत पूरी तरह से बेरोज़गार हैं। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि केवल 7 प्रतिशत स्नातकों को ही समय पर नौकरी मिली, जबकि शेष 93 प्रतिशत स्नातक तीन साल बाद भी किसी स्थायी काम से नहीं जुड़ सके।
हर चार में से एक युवा के पास नहीं है शिक्षा,
रोज़गार या व्यावसायिक कौशल
नीति आयोग की रिपोर्ट से बढ़ी चिंता, खड़गे ने 'डेमोग्राफिक डिजास्टर' कहकर कसा तंज

शिक्षा, व्यावसायिक कौशल और रोज़गार की कमी देश में भयानक रूप से बढ़ रही है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में खुद मोदी सरकार के नीति आयोग ने आंकड़ों के साथ यह जानकारी दी है। 'री-इमैजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत 2047' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में देश की युवा पीढ़ी की एक संकटपूर्ण तस्वीर सामने आई है। नीति आयोग के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की आयु के देश के लगभग 8.7 करोड़ युवा वर्तमान में शिक्षा, नियमित रोज़गार या किसी भी प्रकार के कौशल विकास प्रशिक्षण से नहीं जुड़े हैं। समाजशास्त्र की भाषा में इन्हें 'NEET' यानी 'नॉट इन एजुकेशन, एम्प्लॉयमेंट और ट्रेनिंग' श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। भारत में जहां युवाओं की कुल आबादी लगभग 37 से 38 करोड़ (जो कुल जनसंख्या का लगभग 27 से 29 प्रतिशत है) है, वहां युवाओं के इतने बड़े हिस्से का बेरोज़गार और शिक्षा से दूर होना बेहद चिंता का विषय है। सरल शब्दों में कहें तो देश का हर चौथा युवा आज इस अंधेरे घेरे में कैद है।
नीति आयोग की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि देश के सामने केवल नए रोज़गार के अवसरों की संख्या बढ़ाना ही एकमात्र बड़ी चुनौती नहीं है। इससे भी बड़ी चुनौती पारंपरिक शिक्षा प्रणाली और वर्तमान नौकरी के बाज़ार के बीच मौजूद गंभीर गुणवत्तापूर्ण अंतर व ढांचागत कमी (इन्फ्रास्ट्रक्चरल गैप) है। कई युवा स्नातक (ग्रेजुएट) या उच्च डिग्री प्राप्त करने के बाद भी अपनी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप काम नहीं खोज पा रहे हैं। नतीजतन, 'पढ़ाई पूरी करते ही सम्मानजनक नौकरी मिल जाएगी'—इस पारंपरिक सामाजिक अवधारणा की नींव धीरे-धीरे ढह रही है।
नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के केवल 8.25 प्रतिशत शिक्षित स्नातकों को ही अंततः अपनी योग्यता के अनुकूल सही नौकरी मिल पाती है। स्नातकों का बाकी बड़ा हिस्सा या तो जीवनयापन के लिए बेहद कम वेतन वाली किसी भी नौकरी को करने के लिए मजबूर है, या फिर रोज़गार के अवसर न मिलने के कारण लंबे समय तक बेरोज़गार रहता है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026' रिपोर्ट के आंकड़े भी इस भयानक संकट को और प्रमुखता से रेखांकित करते हैं। उस रिपोर्ट में कहा गया है कि
देश में 15 से 25 वर्ष के युवाओं में से लगभग 40 प्रतिशत पूरी तरह से बेरोज़गार हैं। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि केवल 7 प्रतिशत स्नातकों को ही समय पर नौकरी मिली, जबकि शेष 93 प्रतिशत स्नातक तीन साल बाद भी किसी स्थायी काम से नहीं जुड़ सके।
देश में शिक्षा और रोज़गार का यह संकट मुख्य रूप से स्कूल स्तर से ही शुरू हो जाता है। प्रतिवर्ष बढ़ती स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की दर इसके मूल में है। हाल ही में लोकसभा की एस्टीमेट कमेटी और शिक्षा संबंधी संसदीय समिति द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि
भारत में लगभग 73 प्रतिशत छात्र-छात्राएं 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। लड़कियों के एक बड़े हिस्से की शादी उनके परिवार कम उम्र में ही कर देते हैं।
वहीं, गरीब परिवारों के लड़के कम उम्र में कमाई की तलाश में पढ़ाई अधूरी छोड़कर प्रवासी मजदूर के रूप में दूसरे राज्यों में चले जाते हैं। स्कूल ड्रॉपआउट के लिए यह प्रवृत्ति जिम्मेदार है। इसके साथ ही, संसदीय समिति ने सरकारी स्कूलों की घटती संख्या पर भी चिंता व्यक्त की है। नीति आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि युवाओं की यह बेरोज़गारी केवल सामान्य बेरोज़गारी वृद्धि की समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे बुनियादी ढांचे की एक गहरी खामी काम कर रही है।
इस विशाल ढांचागत अंतर को दूर करने के उद्देश्य से नीति आयोग ने छठी से बारहवीं कक्षा तक 'सामान्य कार्यक्षमता और उद्यमिता कौशल' (जनरल एम्प्लॉयबिलिटी एंड एंटरप्रेन्योरशिप स्किल्स) विषय को सामान्य पाठ्यक्रम में शामिल करने की मजबूत सिफारिश की है। इसके साथ ही नौवीं कक्षा से व्यावसायिक विशेषज्ञता (वोकेशनल स्पेशलाइज़ेशन) के लिए 'कौशल स्टैक' शुरू करने का प्रस्ताव दिया गया है।
हालांकि, जमीनी हकीकत बेहद निराशाजनक है, क्योंकि देश के माध्यमिक विद्यालयों में से 12 में से 1 विद्यालय में भी वर्तमान में व्यावसायिक विषय पढ़ाने की सुविधा या उपयुक्त बुनियादी ढांचा नहीं है। इसके अलावा, नीति आयोग ने पारंपरिक या किताबी डिग्री के बजाय व्यावहारिक और क्षेत्र-आधारित पढ़ाई, 'लर्न एंड अर्न' (सीखें और कमाएं) मॉडल तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) की भागीदारी में शिक्षुता (अप्रेंटिसशिप) का दायरा बढ़ाने की सिफारिश की है।
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि 2014-15 से अब तक देश में विभिन्न योजनाओं के तहत लगभग 7.67 करोड़ लोगों को आधिकारिक रूप से प्रशिक्षित किया गया है और 2025-26 के केंद्रीय बजट में कौशल प्रशिक्षण के उद्देश्य से सरकार ने लगभग 34 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। हालांकि, नीति आयोग ने स्वीकार किया है कि केवल भारी-भरकम बजट आवंटन या प्रशिक्षित लोगों की संख्या बढ़ाकर इस संकट का समाधान नहीं किया जा सकता, जब तक कि उस कौशल प्रशिक्षण का रोज़गार के वास्तविक अवसरों के साथ सीधा संबंध न स्थापित किया जाए।
नीति आयोग की इस चौंकाने वाली रिपोर्ट के सामने आते ही देशभर में तीखी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि भाजपा का शासन भारत की भविष्य की युवा शक्ति को 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकी लाभांश) से 'डेमोग्राफिक डिजास्टर' (जनसांख्यिकी आपदा) में बदल रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का सरकारी वादा आज कहाँ गया? कांग्रेस नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के अपने सम्बोधन में देश की बेरोज़गारी पर एक शब्द भी नहीं बोला। इसके विपरीत, बेरोज़गारी की ज्वलंत समस्या और पढ़ाई की फीस में वृद्धि के विरोध में जो छात्र और युवा समाज लंबा आंदोलन चला रहा है, उनके प्रति सहानुभूति दिखाने के बजाय प्रधानमंत्री ने उन्हें 'दिमागी नक्सल' कहकर हमला बोला है। नीति आयोग की अपनी रिपोर्ट से सामने आए इन आंकड़ों और विपक्षी दलों के एकजुट हमले ने अब मोदी सरकार के 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को एक बड़े कटघरे में खड़ा कर दिया है।

.
.
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...