सरकार की योजना है कि सब कुछ एक ही विभाग के अधीन रहेगा। उनके शब्दों में, "वह सब मदरसा शिक्षा का विभाग नहीं रहेगा।"
जन समाचार मंच
सरकार की योजना है कि सब कुछ एक ही विभाग के अधीन रहेगा। उनके शब्दों में, "वह सब मदरसा शिक्षा का विभाग नहीं रहेगा।"

क्या राज्य में मदरसा शिक्षा नाम की कोई चीज़ शेष रह जाएगी? आरएसएस के संगठन 'विद्या भारती' के एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है। सरकार ने आलिया विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक विकास विभाग के बजाय उच्च शिक्षा विभाग के अधीन लाने की पहल शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद सरकार का फैसला और भी स्पष्ट हो गया है।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने साफ कर दिया है कि राज्य के सभी विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा विभाग के तहत संचालित होंगे, और आलिया विश्वविद्यालय किसी अन्य विभाग के तहत चलेगा, यह सब नहीं चलेगा। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि राज्य में स्कूल शिक्षा विभाग और उच्च शिक्षा विभाग हैं। सरकार की योजना है कि सब कुछ एक ही विभाग के अधीन रहेगा। उनके शब्दों में, "वह सब मदरसा शिक्षा का विभाग नहीं रहेगा।"
राज्य के अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग के मंत्री खुदीराम टुडू ने मीडिया को बताया था कि आलिया विश्वविद्यालय को उच्च शिक्षा विभाग के अधीन लाने और मदरसा सर्विस कमीशन (मदरसा सेवा आयोग) को भंग करके स्कूल सर्विस कमीशन (एसएससी) के माध्यम से शिक्षकों की नियुक्ति करने की योजना है। इसे लेकर मदरसा शिक्षक राज्य के मदरसों की अल्पसंख्यक मान्यता को लेकर भी काफी चिंतित हैं। वे इस योजना के कार्यान्वयन पर कई संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक सवाल उठा रहे हैं। मुख्यमंत्री के बयान के बाद यह आशंका और गहरी हो गई है।
शिक्षकों के एक वर्ग का कहना है कि यदि सरकार एसएससी (SSC) के जरिए नियुक्ति करना चाहती है, तो अल्पसंख्यक मान्यता को रद्द करना होगा, जो संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन करेगा। लेकिन दूसरे पक्ष का दावा है कि वामपंथी सरकार ने विधानसभा में बिल पास करके वह अधिसूचना जारी की थी, उस समय संसद या राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं ली गई थी। परिणामस्वरूप, उसकी कानूनी वैधता पर सवाल उठ रहे हैं। इसलिए, वर्तमान सरकार इस संबंध में बिल पास करके और राष्ट्रपति की मंजूरी लेकर आसानी से और स्थायी रूप से अल्पसंख्यक मान्यता को हटा सकती है।
हालांकि, वर्ष 2020 के 'शेख मोहम्मद रफीक बनाम कांथी मदरसा मैनेजिंग कमेटी' मामले में सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए यह तर्क दिया जा रहा है कि राज्य के मदरसों के अल्पसंख्यक चरित्र को स्वीकार किया गया है। लेकिन शिक्षकों का एक वर्ग इस तर्क पर ज्यादा भरोसा नहीं कर रहा है।
एबीटीए (ABTA) राज्य सचिवालय के सदस्य मणिरुल इस्लाम ने कहा, "अल्पसंख्यक मान्यता को लेकर जो अधिसूचना जारी की गई थी और मदरसों को जो दर्जा दिया गया था, उसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी से कोई कानून नहीं बनाया गया था। इसलिए इसे हटाए जाने की संभावना है। वैसे भी, पूर्व सरकार की मनमानी और वर्तमान परिस्थितियों में अधिकांश मामलों में संविधान के अनुच्छेद 30 का पालन नहीं किया जा रहा है। इसलिए इस सरकार को इस धारा का पूरी तरह से पालन करते हुए संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए थी और अल्पसंख्यकों को अधिक अवसर देने चाहिए थे। लेकिन वर्तमान सरकार बिल्कुल विपरीत दिशा में चल रही है। इससे मदरसे अपने विशिष्ट संवैधानिक अधिकारों से वंचित हो जाएंगे।"
दूसरी ओर, संगठन का दावा है कि मदरसों में नियुक्ति के मामलों में 100-पॉइंट रोस्टर का पालन नहीं किया जाता है, जिसके कारण सामान्य उम्मीदवारों को अधिक अवसर मिलते हैं। यदि एसएससी द्वारा नियुक्ति की जाती है, तो आरक्षण के कारण वह अवसर कम हो जाएगा। इसके अलावा, थियोलॉजी (धर्मशास्त्र) और अरबी विषयों के शिक्षक भी धीरे-धीरे कम हो जाएंगे।
मदरसा सर्विस कमीशन के बाद मदरसा बोर्ड को भी भंग करके उसे माध्यमिक शिक्षा परिषद (वेस्ट बंगाल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन) और उच्च माध्यमिक शिक्षा संसद (वेस्ट बंगाल काउंसिल ऑफ हायर सेकेंडरी एजुकेशन) के अधीन करने की बात भी उठ रही है। यदि राज्य में एनसीईआरटी (NCERT) के पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाया जाता है, तो मदरसों का अपना मूल चरित्र भी समाप्त हो जाएगा। इस पूरे मामले को लेकर जब राज्य के अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग के मंत्री खुदीराम टुडू से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मदरसा कमीशन और मदरसा बोर्ड को इस तरह भंग करने के बाद राज्य में मदरसा शिक्षा नाम की कोई चीज़ बचेगी या नहीं, इसे लेकर मदरसा शिक्षक गहरे संकट और आशंका में हैं।
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साभार:- गणशक्ति
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 05 सितंबर 2026 • 4 मिनट पठन

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