सीपीआई(एम) केवल 'चे' (चे ग्वेरा) की किताबें ही नहीं बेचती। सीपीआई(एम) विद्यासागर, रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी, समरेश बसु, माणिक बंद्योपाध्याय, मृणाल सेन और सौमित्र चटर्जी जैसे विभिन्न विषयों पर भी पुस्तकें बेचती है।
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जन समाचार मंच
सीपीआई(एम) केवल 'चे' (चे ग्वेरा) की किताबें ही नहीं बेचती। सीपीआई(एम) विद्यासागर, रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी, समरेश बसु, माणिक बंद्योपाध्याय, मृणाल सेन और सौमित्र चटर्जी जैसे विभिन्न विषयों पर भी पुस्तकें बेचती है।
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क्या आप दुकानों पर 'दुर्गा पूजा के अवसर पर' लिखते हैं? यह सवाल सुनकर बिमल कुंडू बोले, "कहां लिखूंगा?"
मैंने कहा—अपनी दुकान पर।
राज्य के एक दिवंगत कांग्रेस और तृणमूल नेता दक्षिण कोलकाता में एक दुर्गा पूजा के आयोजक थे। वे सिद्धार्थ शंकर राय और ममता बनर्जी—दोनों सरकारों में मंत्री रहे थे। ममता बनर्जी के कैबिनेट में वे और शुभेंदु अधिकारी सहकर्मी (साथी) थे। उस दिवंगत मंत्री के पूजा पंडाल के आसपास शरदोत्सव के दिनों में खाने-पीने की दुकान लगाने वाले बिमल कुंडू ने कहा, "क्यों, उसकी भला क्या जरूरत है?"
मैंने कहा—मुख्यमंत्री ने कहा है।
उपनगर के रहने वाले बिमल कुंडू ने कहा, "देखा मैंने। लेकिन वह सिर्फ सीपीआई(एम) के लिए है। दुर्गा पूजा के अवसर पर ही पंडाल बनता है। मूर्ति, पंडाल और रोशनी देखने लोग आ रहे हैं। उसी मौके पर गुब्बारे खरीद रहे हैं, एग रोल खा रहे हैं, आइसक्रीम खरीद रहे हैं। तो फिर अलग से 'दुर्गा पूजा के अवसर पर' कोई दुकान पर क्यों लिखेगा? कभी देखा है ऐसा?"
सही बात है। कोलकाता या कोलकाता के आसपास, कांथी या कैनिंग में, शरदोत्सव के दिनों में किसी दुकान पर 'दुर्गा पूजा के अवसर पर' लिखा हुआ नहीं दिखता। तो फिर विधानसभा में शुभेंदु अधिकारी के दिमाग में यह बात कैसे आई?
तृणमूल के शासन में राज्य में आरएसएस का प्रभाव बढ़ा है। ममता बनर्जी ने ही चालाकी से इसे बढ़ावा दिया, मुख्य रूप से अल्पसंख्यकों को डराकर अपनी तरफ बनाए रखने के लिए। पिछले कुछ वर्षों में शरदोत्सव के समय आरएसएस और उनके मुखपत्र के स्टॉल देखे गए हैं। क्या वहां 'दुर्गा पूजा के अवसर पर' लिखा रहता है?
नंदीग्राम के रहने वाले और आरएसएस के दक्षिण बंगाल प्रचार प्रमुख शिवेंद्र त्रिपाठी को याद नहीं आया कि उन्होंने कभी 'दुर्गा पूजा के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पुस्तक बिक्री केंद्र' देखा है या नहीं। हालांकि उन्होंने बताया, "हम जब स्टॉल लगाते हैं तो पुलिस को मौखिक रूप से सूचित कर देते हैं। पूजा समिति से भी बात कर लेते हैं।"
तृणमूल के मुखपत्र के विशेषांक (शरदीय संख्या) में शुभेंदु अधिकारी के लेख कई बार प्रकाशित हुए हैं। हालांकि एक लेखक के रूप में उन्होंने कभी ममता बनर्जी की तरह अतिरिक्त प्रसिद्धि का दावा नहीं किया। लेकिन तृणमूल के सूत्र भी कहते हैं, "पूजा के अवसर पर हम किताबों के स्टॉल लगाते हैं। पूजा विशेषांक और दीदी की किताबें बिकती हैं। पार्टी कार्यकर्ता आपस में बातचीत करते हैं, मेल-मिलाप होता है। यह सब पूजा के संदर्भ में ही होता है। अलग से 'दुर्गा पूजा के अवसर पर' लिखने की क्या आवश्यकता है?" तथापि विधानसभा में मुख्यमंत्री ने उन्हें इस मुद्दे पर नहीं धमकाया।
शुभेंदु अधिकारी ने कहा है, "वे सनातन धर्म को केवल संस्कृति मानते हैं। दुर्गा पूजा न कहकर शरदोत्सव कहते हैं। मैं दुर्गा पूजा समितियों से अनुरोध करता हूं कि यदि वे 'दुर्गा पूजा' न लिखें तो उन्हें एक भी स्टॉल न लगाने दें।"
उनका मुख्य निशाना वामपंथी हैं—विशेष रूप से सीपीआई(एम)।
सीपीआई(एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने "शरदोत्सव नहीं, दुर्गा पूजा लिखना होगा" के मुद्दे पर कहा कि राज्य की वर्तमान मुख्यमंत्री ने भी अतीत में कहा था कि लाइब्रेरी में कौन सी किताबें रखी जाएंगी और कौन सी नहीं, और सभी लाइब्रेरियों में अपनी किताबें रखवा दी थीं। लाइब्रेरियों में कौन-कौन से समाचार पत्र रहेंगे, इसका निर्देश भी उन्होंने दिया था। वास्तव में समाचार पत्रों को अपने नियंत्रण में लाने के लिए उन्होंने ये बातें कही थीं। इस बंगाल में ब्रिटिश काल से ही विभिन्न उत्सव मनाए जाते रहे हैं। नववर्ष, शरदोत्सव, पीठे-पुली जैसे कई त्योहार मनाए जाते रहे हैं। आश्विन महीने की शरद प्रात:काल से ही शारदीय उत्सव मनाया जाता रहा है।
शरदोत्सव के दिनों में और दीपावली पर भी सीपीआई(एम) किताबों के स्टॉल लगाती है। पुलिस को सूचित करना पड़ता है। सीपीआई(एम) की ओर से कई स्थानों पर पुलिस को लिखित रूप से सूचित किया जाता है, तो कहीं मौखिक रूप से बता दिया जाता है। अधिकांश मामलों में पूजा आयोजकों को भी सूचित किया जाता है। जब तक आयोजक कट्टर तृणमूल समर्थक न हों, कोई बाधा नहीं डालता। लेकिन तृणमूल शासन में कई बार, कई जगहों पर सीपीआई(एम) के बुक स्टॉल लगाने में बाधा डाली गई है। तोड़फोड़ की गई है और हमले भी हुए हैं।
अब स्वयं मुख्यमंत्री इस पर बाधा डालना चाहते हैं। वरना विश्वविद्यालयों में भाजपा का कब्जा कायम करने के लिए लाए गए विधेयक की चर्चा के दौरान क्या कोई शरदोत्सव के पुस्तक स्टॉल का मुद्दा उठा सकता है? उस समय यह तर्क दिया गया कि "वे दुर्गा पूजा न कहकर शरदोत्सव कहते हैं।"
इस विषय पर भाषाविद और रवींद्र-विशेषज्ञ पवित्र सरकार ने कहा, "मेरा मानना है कि मुख्यमंत्री के लिए इस तरह की बातें न करना ही बेहतर है। किसी को विपक्षी/शत्रु मानकर लड़ाई करते रहना मुख्यमंत्री पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है। शब्द का एक आक्षरिक (शाब्दिक) अर्थ होता है—जिसे लिटरल मीनिंग कहते हैं; दुर्गा का उत्सव—यह आक्षरिक अर्थ है। जबकि 'शरदोत्सव' एक भाव या व्यंजना है। मुख्यमंत्री की ऐसी बातें मुझे बेहद बचकानी लगती हैं।"
सीपीआई(एम) के पुस्तक स्टॉलों पर आमतौर पर लिखा होता है: 'मार्क्सवादी एवं प्रगतिशील पुस्तक बिक्री केंद्र'। इसका कारण एक ही है—स्टॉल शरदोत्सव के अवसर पर लगाया जाता है, इसलिए अलग से 'शरदोत्सव' लिखने का कोई औचित्य नहीं है। तृणमूल समर्थकों ने बलपायि में पुस्तकालय जला दिया था। मुख्यमंत्री का वास्तविक उद्देश्य सीपीआई(एम) के स्टॉलों को रोकना और प्रगतिशील साहित्य के संग्रह की बिक्री पर रोक लगाना है।
सीपीआई(एम) केवल 'चे' (चे ग्वेरा) की किताबें ही नहीं बेचती। सीपीआई(एम) विद्यासागर, रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी, समरेश बसु, माणिक बंद्योपाध्याय, मृणाल सेन और सौमित्र चटर्जी जैसे विभिन्न विषयों पर भी पुस्तकें बेचती है।
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साभार:- गणशक्ति पत्रिका
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 11 सितंबर 2026 • 5 मिनट पठन

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राजद्रोह /
आंदोलन करना /
देशद्रोह /
हक़ मांगना /
राष्ट्रद्रोह /
बना दिया ।
इन सबके बावजूद /
लोग डर नहीं रहे /
छोटे-छोटे बच्चे /
खिलाफत को /
उतारू हैं ।
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