उजाड़े जा रहे घर, न्याय की उम्मीद में डटे आदिवासी -
केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण पन्ना और छतरपुर के दर्जनों गाँव डूब क्षेत्र व टाइगर रिजर्व के बफर जोन में आ रहे हैं, जिससे हजारों आदिवासी परिवार उजड़ने की कगार पर हैं। बिना उचित-मुआवजे और पुनर्वास के हो रहे इस जबरन विस्थापन के खिलाफ ग्रामीण 'चिता आंदोलन' चला रहे हैं। सत्ता की भयावह बर्बरता - बेधड़क पुलिसिया मार और झूठे मुकदमों में जेल - के बावजूद केन-बेतवा क्षेत्र के हजारों निहत्थे आदिवासी और ग्रामीण अपने जल, जंगल, जमीन और अधिकारों की रक्षा के लिए अंतिम साँस तक संघर्ष करने को संकल्पित हैं।
वे महीनों से 'चिता आंदोलन' चला रहे हैं। परियोजना के लिए प्रशासन और पुलिस द्वारा घरों को तोड़ने, झूठे मुकदमे लादने तथा महिलाओं और युवाओं पर भारी दमन ढाया जा रहा है। इसी क्रम में माकपा नेत्री बृंदा करात के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने विस्थापितों और जेल में बंद दलित पार्षद दिव्या अहिरवार से मुलाकात कर उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा दिया है। इस अमानवीय विस्थापन और प्रशासनिक अत्याचार के खिलाफ 'चिता आंदोलन' की यह हुंकार अब राजधानी तक फैलने को तैयार है।

उल्लेखनीय है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से 4,141 हेक्टेयर जमीन डूब क्षेत्र में आ रही है, जिसमें 1,314 हेक्टेयर जमीन पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन की है। प्रशासन के अनुसार इससे 21 गाँवों के 7,350 परिवार प्रभावित होने वाले हैं, जबकि वास्तविक संख्या 10,000 के आसपास है। इसके अलावा पन्ना और छतरपुर जिलों में बन रहे अन्य बाँधों से भी 2,000 से ज्यादा परिवार प्रभावित होंगे। ये सभी लोग 'जय किसान संगठन' के नेतृत्व में 'चिता आंदोलन' चला रहे हैं। इनमें 60 प्रतिशत परिवार आदिवासी हैं।

केन-बेतवा विस्थापितों के बीच पहुँचा वाम प्रतिनिधिमंडल
रानी आदिवासी ने पूर्व सांसद और प्रमुख वामपंथी नेता बृंदा करात से पूछा
“क्या न्याय माँगना अपराध है ?”
मध्यप्रदेश से जसविंदर सिंह

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“मैम, क्या न्याय माँगना अपराध है?”
यह पहला सवाल है, जो रानी आदिवासी ने पूर्व सांसद और प्रमुख वामपंथी नेता बृंदा करात से पूछा। बृंदा करात 26 और 27 अक्टूबर को केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से प्रभावित आंदोलनकारियों और विस्थापितों के साथ एकजुटता व्यक्त करने पहुँची थीं।
उल्लेखनीय है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से 4,141 हेक्टेयर जमीन डूब क्षेत्र में आ रही है, जिसमें 1,314 हेक्टेयर जमीन पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन की है। प्रशासन के अनुसार इससे 21 गाँवों के 7,350 परिवार प्रभावित होने वाले हैं, जबकि वास्तविक संख्या 10,000 के आसपास है। इसके अलावा पन्ना और छतरपुर जिलों में बन रहे अन्य बाँधों से भी 2,000 से ज्यादा परिवार प्रभावित होंगे। ये सभी लोग 'जय किसान संगठन' के नेतृत्व में 'चिता आंदोलन' चला रहे हैं। इनमें 60 प्रतिशत परिवार आदिवासी हैं।
रानी आदिवासी भी इस आंदोलन का हिस्सा हैं। वे चिता पर लेटकर "न्याय दो या मार डालो" की माँग कर रही हैं। बृंदा करात के नेतृत्व में प्रतिनिधि मण्डल में आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक दुल्लीचंद मीणा, रामनारायण कुररिया और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्य सचिव जसविंदर सिंह भी शामिल थे।
"प्रतिनिधि मंडल ने इस आंदोलन के प्रति जनता के समर्थन को भी देखा | उनका संकल्प है कि जब तक वे अपना हक हांसिल नहीं कर लेते हैं, तब तक वे अपनी लड़ाई जारी रखेंगे, चाहे इसके लिए कितनी भी कुर्बानी करनी पड़े | प्रशासन शायद उनके इसी संकल्प और जज्बे से डरा हुआ है और इसीलिए दमन का सहारा लेकर उनके हौंसले को पस्त करने की नाकाम कोशिश कर रहा है l " - जसविंदर सिंह , मध्यप्रदेश राज्य सचिव ,भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)

सत्ता की भयावह बर्बरता और दमन
रानी आदिवासी बनहारी कलां टपरिया गाँव की रहने वाली हैं। वे बताती हैं कि 27 सितंबर की रात जब वे अपने घर में थीं, तब पुलिस जबरन अंदर घुसी और उन्हें पीटते हुए जातिसूचक व लिंगसूचक गालियाँ देने लगी। पुलिस ने कहा, "तुम्हें चिता में लेटने का बहुत शौक है, अब पुलिस तुम्हें चौकी में ले जाकर लिटाएगी।" चारपाई पर सो रहे बच्चों को जमीन पर पटक दिया गया और पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा उन्हें बेरहमी से पीटा गया , उनके कपड़े तक फाड़ दिए गए।
एक अन्य युवा इंदरपाल आदिवासी ने बताया कि उनकी माँ को पुलिस बेरहमी से पीट रही थी। असहाय इंद्रपाल जब अपनी माँ को बचा नहीं सके , तो वह इस क्रूरता का वीडियो बनाने लगे । पुलिस ने उनका मोबाइल छीनकर तोड़ दिया और उनकी बेरहमी से पिटाई की। दो दिन थाने में रखने के बाद छतरपुर जिले के किसी छह महीने पुराने धारा 307 के मुकदमे में उन्हें आरोपी बना दिया गया, जिसके बारे में वे जानते तक नहीं थे, वहाँ जाना तो दूर के बात है।
ऐसे झूठे मुकदमे कई आंदोलनकारियों पर लादे गए हैं। सबसे गंभीर मामला दिव्या अहिरवार का है। 24 वर्षीया दलित युवती दिव्या, छतरपुर जिले की बिजावर नगर पंचायत की सबसे युवा पार्षद हैं और 'जय किसान संगठन' की सक्रिय सदस्य हैं। उन्हें पुलिस ने पकड़कर पीटा और जमीन पर घसीटा। उनकी पीठ और शरीर पर गंभीर चोटों के निशान हैं। जातिसूचक गालियाँ देने के साथ ही उनका कुर्ता फाड़ दिया गया और उन्हें दो किलोमीटर तक नंगे बदन ले जाया गया। बाद में एक महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें टी-शर्ट दी। दस्तखत कराने के लिए मारपीट की गई, लेकिन इनकार करने पर उन्हे भी झूठे मुकदमों में फँसाकर जेल भेज दिया गया। बृंदा करात, जसविंदर सिंह और आंदोलन के नेता अमित भटनागर ने 27 अक्टूबर को जेल में दिव्या अहिरवार से मुलाकात की और आंदोलन को हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया।

[फोटो साभार 'डाउन टू अर्थ'- 13 अप्रैल 2026। खबर का लिंक]
अधिकारों का हनन और कानून की अनदेखी
असली प्रश्न यह है कि इस भारी दमन के बावजूद निहत्थे और असहाय आदिवासी और ग्रामीण इस लड़ाई को क्यों लड़ रहे हैं? क्योंकि परियोजनाओं और विकास के नाम पर सरकार ने उनका सब कुछ छीन लिया है l बिना मुआवजा दिए उनके घर तोड़ दिए गए l उनके गांवों की बिजली काट कर उन्हें परेशान किया गया | उनकी खड़ी फसल उजाड़ दी गई और मुआवजे के नाम पर उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़का गया | घर का मुआवजा 60 हज़ार से लेकर 1.50 लाख रुपये दिया गया | इसमे सिर्फ मकान कच्चा है या पक्का, इसे ही आधार बनाया गया l घर की जमीन की कीमत नहीं दी गयी | खेती की जमीन का मुआवजा 5 लाख रुपए दिया गया | उनकी खड़ी फसलें उजाड़ दी गई और मुआवजा भी नहीं दिया गया |
विस्थापन के दौरान 'भूमि अधिग्रहण कानून 2013' की पूरी तरह अनदेखी की गई है। 'जमीन के बदले जमीन' का प्रावधान सरकारी पैकेज से नदारद है। विस्थापन से पहले कोई 'सामाजिक प्रभाव अध्ययन' (Social Impact Assessment) नहीं किया गया। पीढ़ियों से साथ रहने वाले समुदायों को खदेड़ दिया गया और उनके सामाजिक ताने-बाने को तार-तार कर दिया गया। उनके प्राकृतिक जीविका के साधनों को छीन लिया गया। 'वनाधिकार कानून' के तहत उन्हें वनभूमि के पट्टे भी नहीं दिए गए।
26 अक्टूबर की रात प्रतिनिधिमंडल ने तारा गाँव का दौरा किया, जहाँ सात गाँवों के विस्थापित जमीन खरीदकर टूटी-फूटी झोपड़ियों में रह रहे हैं। वहाँ न सड़क है, न स्कूल, न पानी की निकासी और न ही अस्पताल। उन्होंने जो जमीन खरीदी है, उसकी कोई रजिस्ट्री या लिखित दस्तावेज नहीं है, जिससे उन पर भविष्य में फिर बेदखल होने का खतरा मँडरा रहा है।

[फोटो साभार 'इंडियन एक्स्प्रेस' 23 जुलाई 2026। खबर का लिंक ]
क्या इस प्रोजेक्ट की वाकई जरूरत है?
वर्ष 2007 में पन्ना की तत्कालीन कलेक्टर दीपाली रस्तोगी ने जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर विस्तृत ब्योरा दिया था कि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पन्ना जिले के लिए अत्यंत खर्चीला और नुकसानदायक है। उन्होंने 1983 की प्रस्तावित योजनाओं का हवाला देते हुए स्पष्ट किया था कि यदि उन पर सही से अमल किया जाए, तो केन नदी में एक बूंद भी अतिरिक्त पानी नहीं बचता।
प्रशासनिक मुलाकात, ज्ञापन और भविष्य का संघर्ष
प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलेक्टर से मुलाकात कर विस्थापन में अनियमितताओं, कानून के उल्लंघन, मुआवजे में भ्रष्टाचार, दमनकारी रवैये और झूठे मुकदमों को वापस लेकर दिव्या अहिरवार की रिहाई की माँग की। कलेक्टर ने जनसुनवाई कर सभी विस्थापितों का पक्ष सुनने, उच्चस्तरीय कमेटी से जाँच कराने और झूठे मुकदमों की समीक्षा का आश्वासन दिया।
इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की और पुलिस अधीक्षक के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर दमन, महिलाओं के साथ बदतमीजी और मारपीट, एक 17 वर्षीय नाबालिग बच्ची को रात में गाँव में घुमाने की घटना का विरोध करते हुए दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की माँग की गई।
26 अक्टूबर की शाम बृंदा करात, जसविंदर सिंह और अमित भटनागर ने पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए प्रशासनिक दमन और भाजपा सरकार की जनविरोधी नीतियों की कड़े शब्दों में आलोचना की। उन्होंने इस आंदोलन को भोपाल से लेकर दिल्ली तक ले जाने का आह्वान किया।

[फोटो साभार 'इंडियन एक्स्प्रेस' 19 जुलाई 2026। खबर का लिंक]

जसविंदर सिंह सीपीआई(एम) मध्यप्रदेश के राज्य सचिव और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं।
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23 जुलाई 2026 को 'इंडियन एक्स्प्रेस' में प्रकाशित रिपोर्ट का लिंक
19 जुलाई 2026 को 'इंडियन एक्स्प्रेस' में प्रकाशित रिपोर्ट का लिंक
13 अप्रैल 2026 की 'डाउन टू अर्थ में प्रकाशित रिपोर्ट का लिंक
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