राम मंदिर के पूर्व मुख्य कोषाध्यक्ष महिपाल सिंह (संघ से जुड़े व्यक्ति हैं) ने आरोप लगाया है:
"राम मंदिर में हर दिन चोरी होती है। मैंने खुद चोरी पकड़ी है। मैंने उस चोरी की बात राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य गोपाल राव को बताई थी। अगले ही दिन चंपत राय ने मुझे पद से हटा दिया था। मंदिर के सीसीटीवी फुटेज भी मिटा दिए गए।" उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा गठित एसआईटी (SIT) की जांच से पता चल रहा है कि 40 दिनों में भक्तों द्वारा दिए गए दान के पैसे 70 बार चोरी हुए हैं। ऐसा भी सुनने में आ रहा है कि हर दिन औसतन 5-6 लाख रुपये की चोरी हुई है। खुद मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी हैं, उन्होंने कहा है, "यह चोरी नहीं, डकैती है।"
राम मंदिर में चोरी की जिम्मेदारी, संघ को लेनी ही होगी
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स्वर्णेंदु दत्त
"राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे।" हनुमान चालीसा की इस चौपाई का अर्थ है—राम की नगरी के द्वार की रक्षा हनुमान जी करते हैं; उनकी अनुमति के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता। अनगिनत श्रद्धालु हर दिन 'हनुमान चालीसा' का पाठ करते हैं और इन बातों पर अटूट विश्वास रखते हैं। लेकिन आरएसएस-विश्व हिंदू परिषद के लोगों ने इस चौपाई को गलत साबित करते हुए हनुमान और रामचंद्र की उपस्थिति में ही अयोध्या के राम मंदिर से जमकर धन लूटा है। आभूषणों समेत अन्य मूल्यवान सामग्रियों की लूट के भी आरोप लगे हैं। उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा गठित एसआईटी (SIT) की जांच से पता चल रहा है कि 40 दिनों में भक्तों द्वारा दिए गए दान के पैसे 70 बार चोरी हुए हैं। ऐसा भी सुनने में आ रहा है कि हर दिन औसतन 5-6 लाख रुपये की चोरी हुई है। खुद मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी हैं, उन्होंने कहा है, "यह चोरी नहीं, डकैती है।" इसके बाद राम मंदिर में लूट के पैमाने पर कोई सवाल ही नहीं रह जाता।
मुख्य आरोपी कौन हैं?
राम मंदिर के पूर्व मुख्य कोषाध्यक्ष महिपाल सिंह ने आरोप लगाया है:
"राम मंदिर में हर दिन चोरी होती है। मैंने खुद चोरी पकड़ी है। मैंने उस चोरी की बात राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य गोपाल राव को बताई थी। अगले ही दिन चंपत राय ने मुझे पद से हटा दिया था ।मंदिर के सीसीटीवी फुटेज भी मिटा दिए गए।"
महिपाल खुद संघ से जुड़े व्यक्ति हैं। अयोध्या मंदिर में नियुक्त लगभग सभी कर्मचारी आरएसएस-विश्व हिंदू परिषद के भरोसेमंद लोग हैं। यहाँ तक कि निजी सुरक्षा गार्ड, बैंक में पैसे गिनने वाले कर्मचारी, सीसीटीवी नियंत्रित करने वाली एजेंसी—सब संघ द्वारा ही नियुक्त हैं। पिछले एक महीने से अधिक समय में राम मंदिर के भ्रष्टाचार को लेकर तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहे हैं—ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, सदस्य अनिल मिश्रा और आमंत्रित सदस्य गोपाल राव। ये सभी आरएसएस-विश्व हिंदू परिषद के नेता हैं। याद रखना जरूरी है कि आरएसएस का सबसे शक्तिशाली और सबसे बड़ा आनुषंगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद ही है। इसी संगठन के दम पर आरएसएस ने अपना विस्तार किया है और राम मंदिर आंदोलन में भी विश्व हिन्दू परिषद की भूमिका ही मुख्य थी। उस संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चम्पत राय हैं। दक्षिण भारत में संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी गोपाल राव के पास थी, जिन्हें मंदिर निर्माण के समय अयोध्या लाया गया था। अनिल मिश्रा भी अयोध्या के पुराने आरएसएस संगठक हैं। लेकिन पुलिस ने इनके खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं की। इसके बजाय निचले स्तर के कुछ कर्मचारियों को गिरफ्तार कर उनके सिर पर दोष मढ़ा जा रहा है। इतनी कड़े सुरक्षा घेरे और निगरानी के जाल को दरकिनार कर कुछ साधारण कर्मचारियों के लिए इस स्तर की लूट को अंजाम देना क्या वाकई संभव है?
मंदिर निर्माण के समय से ही सारा अधिकार चम्पत राय के हाथों में रहा है। पिछली सदी के नब्बे के दशक में संघ ने उन्हें अयोध्या भेजा था। वह बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपियों में से एक हैं; सीबीआई की चार्जशीट में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ चम्पत राय का भी नाम था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा विवादित स्थल पर मंदिर बनाने का निर्देश देने के बाद से ही सब कुछ चम्पत राय के नियंत्रण में आ गया।आसपास के इलाकों के कई प्राचीन मंदिरों पर कब्जा करने और जमीन के लेन-देन में भ्रष्टाचार को लेकर चम्पत राय के खिलाफ बार-बार आरोप लगे हैं। वर्ष 2020 से ही ये आरोप लग रहे हैं, लेकिन केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की और चम्पत राय को खुली छूट दी गई। मंदिर निर्माण करने वाली कम्पनी के एक इंजीनियर का आरोप है कि निर्माण कार्य के लिए 40 फीसदी कमीशन भी देना पड़ा है। अयोध्या के आम लोगों की जुबान पर है कि चम्पत राय की मर्जी के बिना राम मंदिर परिसर में एक पत्ता भी नहीं हिलता।
वही चम्पत राय पहले मंदिर में चोरी की बात से साफ इन्कार कर रहे थे। बाद में जब देश भर में आरएसएस-भाजपा पर भारी राजनीतिक दबाव बना, तो चम्पत राय से 'इस्तीफा' दिलवाया गया। लेकिन हाल ही में ट्रस्ट की बैठक के बाद उन्हें 'क्लीन चिट' दे दी गई है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने चम्पत राय को 'महापुरुष' और 'निष्कलंक' बताते हुए प्रमाण पत्र दे दिया है। इसके बाद जाँच का क्या नतीजा होगा, यह पूरी तरह साफ है। संकेत मिल रहे हैं कि एसआईटी से राहत मिलने के कुछ समय बाद चम्पत राय फिर से पहले की तरह ट्रस्ट के सर्वेसर्वा बन जाएंगे।
राम मंदिर असल में किसका है?
अयोध्या के राम मंदिर मूल रूप से रामानंद संप्रदाय के विभिन्न अखाड़ों और संतों के रहे हैं। लेकिन वर्तमान राम मंदिर का मालिकाना हक किसका है? उस मंदिर के निर्माण और प्रबंधन के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जो ट्रस्ट बना, उस पर नियंत्रण किसका है? एक शब्द में उत्तर है—आरएसएस का।
यह कैसे हुआ? यह उत्तर जानने के लिए राम मंदिर आंदोलन के अतीत के पन्नों को पलटकर देखना होगा:
1885 में ब्रिटिश शासन के दौरान बाबरी मस्जिद नहीं, बल्कि मस्जिद के चबूतरे को राम का जन्मस्थान बताते हुए निर्मोही अखाड़ा ने पहला मुकदमा दायर किया था। इसके बाद 1949 में जब बाबरी मस्जिद के भीतर रात के अंधेरे में राम-सीता की मूर्तियां रखकर कब्जा किया गया, तो उस काम में संगठन के रूप में हिंदू महासभा शामिल थी। 1950 में हिंदू महासभा के नेता गोपाल सिंह विशारद ने बाबरी मस्जिद को ही 'रामलला' का जन्मस्थान बताते हुए मुकदमा दायर किया। एक और मुकदमा रामचंद्र परमहंस का था, जो बाद में मंदिर आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक बने। दूसरी ओर, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड सहित मुस्लिमों की तरफ से भी कई मुकदमे थे। लेकिन इस पूरे विवाद की कानूनी लड़ाई में आरएसएस कहीं नहीं था। 1989 में विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष देवकीनंदन अग्रवाल (जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश थे) ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की कि स्वयं भगवान यानी 'रामलला या बालक राम को इस मुकदमे का एक पक्ष बनाया जाए। सिर्फ रामलला ही नहीं, बल्कि उनके जन्मस्थान को भी मामले में पक्ष बनाने की अपील की गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस याचिका को स्वीकार कर लिया। चूँकि कानूनन रामलला को 'नाबालिग' माना गया, इसलिए मुकदमे में उनके प्रतिनिधि के रूप में एक 'नेक्स्ट फ्रेंड' रहेंगे। विश्व हिन्दू परिषद के नेता देवकीनंदन अग्रवाल ने खुद रामलला का 'सखा' बनने की अर्जी दी और अदालत ने उसे स्वीकार कर लिया।
इसके बाद से 30 वर्षों में विश्व हिंदू परिषद ने समय-समय पर अपने 3 व्यक्तियों को 'सखा' नियुक्त किया। 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि का अधिकार 'रामलला' को दिया, तो वास्तव में उस भूमि का कानूनी अधिकार तत्कालीन रामलला के 'सखा' और विश्व हिन्दू परिषद के नेता त्रिलोकीनाथ पांडे को मिला। यानी व्यावहारिक रूप से जमीन का पूरा अधिकार विश्व हिंदू परिषद या आरएसएस की झोली में चला गया। 1984 से विश्व हिन्दू परिषद राम जन्मभूमि आंदोलन में उतरने के बावजूद लेकिन कानूनी लड़ाई में वह सीधे तौर पर कहीं नहीं थी।रामलला' को पक्ष बनाकर ही वे इस मुकदमे में दाखिल हुए और अंततः मूल दावेदारों को हटाकर जमीन पर कब्जा कर लिया।
राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट की घोषणा लोकसभा में खुद 'संघ के स्वयंसेवक' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी और उन्हीं की देखरेख में ट्रस्ट का गठन किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर निर्मोही अखाड़ा के महंत दीनेंद्र दास को इस ट्रस्ट में शामिल किया गया, जबकि बाकी सभी सदस्य आरएसएस और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा तय किए गए। उनमें से भी अधिकांश सदस्य केवल नाम के लिए हैं, सारा असली अधिकार शुरू से ही आरएसएस-विश्व हिंदू परिषद के पास रहा है। ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद उनकी जगह वर्तमान आरोपी डॉ. अनिल मिश्रा को शामिल किया गया, जो अयोध्या के ही एक होम्योपैथी चिकित्सक और पुराने आरएसएस संगठक हैं। इसी तरह, ट्रस्ट में आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किए गए गोपाल राव को मंदिर निर्माण कार्य की जिम्मेदारी दी गई थी। उनके सगे भतीजे पर ही निर्माण सामग्री में 40 फीसदी कमीशन लेने का आरोप है, साथ ही वीआईपी दर्शन के टिकटों की बिक्री में भी भारी भ्रष्टाचार के आरोप हैं। यानी इस मंदिर और इसकी पूरी अकूत संपत्ति का असली मालिक और नियंत्रक केवल आरएसएस-वीएचपी ही है।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के जिम्मेदार चार्जशीट में नामजद रहे पुराने कारसेवकों से लेकर अयोध्या के विभिन्न प्रभावशाली मंदिरों के साधु-संतों और स्थानीय हिंदुत्ववादी संगठनों के नेताओं का अब साफ दावा है कि राम मंदिर असल में आरएसएस-भाजपा का पैसा उगाहने का केंद्र बन चुका है। उनका स्पष्ट आरोप है कि चोरी का पैसा और सामग्रियां संघ तक पहुँचाई गई हैं, इसीलिए चम्पत राय और अन्य मुख्य आरोपियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा रही है।
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का कोई रास्ता नहीं।
करोड़ों श्रद्धालुओं के पैसे के इस बड़े गबन की घटना के सामने आने के बाद आरएसएस, वीएचपी और केंद्र व राज्य की दोनों सरकारें इसकी पूरी जिम्मेदारी ट्रस्ट पर मढ़कर खुद को बचाने में जुट गई हैं—मानो मंदिर ट्रस्ट कोई निरपेक्ष संस्था हो। इस पूरे मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। इतना बड़ा कांड हो जाने के बाद भी वे ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे उन्हें कुछ पता ही न हो। याद रखा जाना चाहिए कि मंदिर के भूमि पूजन, उद्घाटन, प्राण-प्रतिष्ठा और ध्वजारोहण के हर मुख्य कार्यक्रम के मंच पर मुख्य रूप से तीन ही लोग मौजूद थे—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और यही चम्पत राय। चुनावी सभाओं में मंदिर निर्माण का पूरा श्रेय लेकर मोदी ने खुलेआम वोट मांगे हैं; ऐसे में अब मोदी या भागवत इस चोरी और वित्तीय अनियमितता की जिम्मेदारी से इन्कार नहीं कर सकते।
लूट की इस घटना ने संघ परिवार के असली चेहरे को देश के सामने बेनकाब कर दिया है। वास्तविक अर्थों में, धर्मपरायण आम लोगों की भक्ति, आस्था और विश्वास से आरएसएस का कोई भावनात्मक सरोकार नहीं है, उनका मुख्य लक्ष्य धर्म की आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करना ही है। संघ परिवार के मुखौटे के पीछे की यह कड़वी हकीकत इस घटना से काफी हद तक जनता के सामने आ चुकी है।
गाँधी जी की हत्या के समय लगे आरोपों के बाद आरएसएस के सामने इससे बड़ा संकट कभी नहीं आया था। आम धर्मविश्वासियों के बीच संघ की विश्वसनीयता पर आज गहरे सवाल खड़े हो गए हैं। यही कारण है कि आरएसएस-भाजपा इस असहज स्थिति से जनता का ध्यान भटकाने और बाहर निकलने की पुरजोर कोशिश कर रही है, जिसके लिए आने वाले समय में किसी बड़ी साजिश या ध्रुवीकरण का सहारा लिया जा सकता है। ऐसे में देश के सौहार्द और संविधान के पक्ष में खड़े संगठनों, व्यक्तियों और संस्थानों को तुरंत धर्मप्राण जनता के बीच पहुँचना होगा। उन्हें यह बात साफ तौर पर समझानी होगी कि संघ परिवार का 'हिंदुत्व' देश या धर्म की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि केवल उनके अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए है। आज धर्म, देश और मानवता को बचाने के लिए यह काम महत्वपूर्ण है।
लेखक "अयोध्यार विनिर्मान:समन्वय थेके एकाधिपत्य" (अयोध्या का पुनर्निर्माण: समन्वय से एकाधिकार तक) बांग्ला में प्रकाशित पुस्तक के लिए मुजफ्फर अहमद स्मृति पुरस्कार से सम्मानित।)
साभार: बांग्ला साप्ताहिक 'देश हितैषी'। शुक्रवार, 17 जुलाई, 2026 । अनुवाद: अपराजिता ।
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