वोटर लिस्ट में शुद्धि के नाम पर करोड़ों नागरिकों के मताधिकार पर डाका- यह लोकतंत्र का सुधार नहीं, उसका संहार है! विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में अन्य आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के एकतरफा फैसलों ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी सॉफ्टवेयर, आईटी विभाग के केंद्रीकरण और 'फॉर्म 7' के थोक दुरुपयोग के जरिए करोड़ों पात्र व अल्पसंख्यकों के नाम मतदाता सूची से बाहर करने की साजिश का पर्दाफाश हुआ है। अपीलों की जांच में 91% मामलों में नाम बहाल होना आयोग की मनमानी और न्यायिक ट्रिब्यूनल व सुप्रीम कोर्ट की नाकामी को उजागर करता है। यदि निष्पक्षता और जिम्मेदार अधिकारियों की बर्खास्तगी की मांग नहीं उठाई गई, तो देश के चुनावी लोकतंत्र का भविष्य बेहद अंधकारमय है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की चुप्पी, चुनाव आयोग का आंतरिक विवाद और करोड़ों देशवासियों को मतदाता सूची से बाहर करने की साज़िश का पूरा सच।
चुनावी लोकतंत्र में धांधली का पर्दाफ़ाश
एसआईआर के ज़रिये मताधिकार पर बड़ा हमला
~ नीलोत्पल बसु ~
हाल ही में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की लंबी वाचाल चुप्पी एक बेहद संक्षिप्त बयान में सिमट कर रह गई। उन्होंने दावा किया कि नागरिकों को हुई 'मामूली असुविधा' के बावजूद देश भर में निष्पक्ष चुनाव कराने हेतु मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर/SIR) आवश्यक था। हालांकि, यह मासूम सा लगने वाला बयान किसी बड़े हिमशैल के ऊपरी सिरे जैसा ही है।
इस मामले में असली धमाका 23 सितंबर को 'इंडियन एक्सप्रेस' के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित रितिका चोपड़ा के नेतृत्व वाली खोजी रिपोर्ट से हुआ। स्वतंत्र मुख्यधारा मीडिया के अस्तित्व पर उठते सवालों के बीच इस रिपोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग के भीतर चल रही मनमानी और कार्यप्रणाली का पर्दाफ़ाश कर दिया। इस खुलासे ने उन सभी आशंकाओं को सच साबित कर दिया है, जो काफी समय से जताई जा रही थीं।
चुनाव आयोग के भीतर नियम-कानूनों की अनदेखी
कानून के मुताबिक चुनाव आयोग में तीनों चुनाव आयुक्तों का दर्जा और अधिकार बराबर होते हैं। इसके बावजूद, ज्ञानेश कुमार ने दो अन्य आयुक्तों की 14 आपत्तियों को दरकिनार करते हुए एकतरफ़ा फ़ैसले लिए। यहाँ तक कि आयुक्त विवेक जोशी ने एक गुप्त नोट लिखकर इस प्रक्रिया को 'अनधिकृत और अवैध' तक करार दिया। इस सूचना के सार्वजनिक होने के बाद चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया ने इस विवाद की पुष्टि ही की है। आयोग ने इन गंभीर आपत्तियों और मतभेदों को महज़ एक सामान्य विवाद बताकर टालने की कोशिश की।
नियमों में मनमाना बदलाव और तानाशाही रवैया
अब यह साफ़ हो रहा है कि बिहार में एसआईआर प्रक्रिया शुरू करते समय 2002-03 के मिनट्स (कार्यविवरण) को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया था। एसआईआर में नागरिकता से जुड़े सवाल शामिल करने के लिए संसद को बिना सूचित किए 'फॉर्म 6' का प्रारूप बदला गया, ताकि नागरिकों से अतिरिक्त जानकारी मांगी जा सके। यह चुनावी क़ानूनी ढांचे का सीधा उल्लंघन था। चुनाव आयोग के दो सदस्यों- संधू और जोशी- ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया था, लेकिन ज्ञानेश कुमार ने उनकी आपत्तियों को दरकिनार कर इसे सरकारी फ़ैसला बना दिया। इसके अलावा एसआईआर के संगठनात्मक ढांचे में भी नियमविरुद्ध बदलाव किए गए। क़ानून के अनुसार मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार केवल 'निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी' (ERO) के पास होता है, जो 'बूथ लेवल अफ़सर' (BLO) की रिपोर्ट के आधार पर काम करते हैं। लेकिन अमेरिकी सॉफ़्टवेयर के उपयोग के बहाने पूरी प्रक्रिया को चुनाव आयोग के आईटी प्रमुख के अधीन केंद्रित कर दिया गया। आयोग की अनभिज्ञता में पुराने आईटी प्रमुख को हटाकर सीमा खन्ना को लाया गया, जो केवल ज्ञानेश कुमार को रिपोर्ट करती थीं। दोनों आयुक्तों के विरोध के बावजूद, बिना किसी ऑडिट (लेखा-परीक्षा) के मतदाता डेटाबेस का केंद्रीकरण कर दिया गया। इसका सीधा अर्थ यह था कि निचले स्तर के तंत्र को दरकिनार कर शीर्ष स्तर से ही मतदाता सूची में मनमाने ढंग से नाम जोड़े या हटाए जा सकते थे।
लाखों वैधानिक मतदाताओं के नाम हटाने की साज़िश
गोवा और पश्चिम बंगाल के उदाहरणों से यह मनमानी साफ़ झलकती है। पश्चिम बंगाल में 16 लाख मतदाताओं के नाम हटाने के मनमाने आवेदन दाखिल किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग द्वारा दाखिल हलफ़नामे से स्पष्ट है कि पुनरीक्षण में छूटे 27 लाख में से 22 लाख लोगों ने दोबारा नाम जुड़वाने के लिए आवेदन किया था (जो राज्य की मुख्यमंत्री के दावों के विपरीत था)। वहीं, बाकी 16 लाख नाम बिना किसी औपचारिक मंज़ूरी के आयोग के प्रस्ताव पर हटा दिए गए। नतीजतन, आज 38 लाख मतदाता न्यायिक ट्रिब्यूनल के फ़ैसले के इंतज़ार में हैं, जिसकी प्रक्रिया पूरी होने में 12 साल तक लग सकते हैं। यह स्थिति देश के चुनावी लोकतंत्र की नींव पर हमला है। पिछले साल बिहार से शुरू हुए एसआईआर ने न केवल चुनाव संचालन को, बल्कि पूरी राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित किया है। इसने चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता और साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कठोर शर्ते और समय-सीमा का अभाव
2002-03 के नियमों के तहत मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए किसी नए आवेदन की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन 2025 की प्रक्रिया में बुनियादी बदलाव कर मतदाताओं से 11 प्रकार के दस्तावेज़ मांगे गए। अगर किसी का नाम 2002-03 से पहले की सूची में माता-पिता के नाम के साथ जुड़ा था, तो उसे दस्तावेज़ देने से छूट का चालाकी भरा दावा किया गया था, लेकिन व्यावहारिक रूप से इस नियम ने भ्रम पैदा किया। इसके साथ ही, इतने बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण के लिए बेहद कम समय दिया गया। विपक्षी दलों के कड़े विरोध के बावजूद चुनाव आयोग ने स्थापित परंपराओं को तोड़ा। अतीत में ऐसे किसी भी बड़े कदम के लिए सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने की परंपरा रही है, जिसे इस बार पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
13 करोड़ से अधिक मतदाता सूची से बाहर होने का ख़तरा
बिहार एसआईआर के नतीजों में ही 65 लाख नाम हटा दिए गए थे, जो एक बड़ी चेतावनी थी। चुनावी विश्लेषकों ने आशंका जताई थी कि देश भर में यह आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंच सकता है। हालांकि सत्ता पक्ष और आयोग ने इसका मज़ाक उड़ाया था, लेकिन नागालैंड और त्रिपुरा को छोड़कर अब तक प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में यह आंकड़ा 13 करोड़ 37 लाख तक पहुंच चुका है। इसमें अभी हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के आंकड़े शामिल भी नहीं हैं। यह आंकड़ा केवल बड़ा ही नहीं है, बल्कि राज्यों की कुल जनसंख्या की तुलना में बेहद चौंकाने वाला भी है। इसके दो ही मतलब हो सकते हैं—या तो मतदाताओं की गिनती कम हुई है या आबादी ज़्यादा दर्शाई गई है। चूंकि दोनों काम सरकारी एजेंसियां ही करती हैं, इसलिए साफ़ है कि एसआईआर मसौदे में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे गए हैं।
पश्चिम बंगाल का अनुभव और ट्रिब्यूनल का सच
राज्यवार समीक्षा से साफ़ होता है कि यह प्रक्रिया ख़ारिज किए जाने योग्य थी। पश्चिम बंगाल में प्राथमिक मसौदे के बाद विसंगतियों को चिन्हित करने के लिए एक रैंडम एल्गोरिदम आधारित तीसरी परत जोड़ दी गई। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 19 न्यायिक ट्रिब्यूनल बनाए गए, ताकि नाम हटाने के फैसलों की जांच हो सके। इन ट्रिब्यूनलों के पास कुल 38,10,620 अपीलें/आवेदन पहुंचे। इनमें से 22 लाख आवेदन नाम दोबारा जुड़वाने के लिए थे, जबकि 16 लाख मामले आयोग द्वारा 'फॉर्म 7' के ज़रिये नाम हटाने के प्रस्ताव से जुड़े थे। अब तक जांच की गई 82,782 अपीलों में से 91 प्रतिशत मामलों में मतदाताओं के नाम वापस बहाल किए गए हैं, जो आयोग की कार्रवाई पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

'फॉर्म 7' का दुरुपयोग और सत्ताधारी दल की भूमिका
मतदाता सूची से नाम काटने के लिए 'फॉर्म 7' के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने बीएलओ (BLO) पर दबाव बनाकर थोक में 'फॉर्म 7' जमा कराए, जो कि संसद द्वारा बनाए गए चुनावी क़ानूनों का उल्लंघन है।
11 सितंबर के 'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादकीय का हवाला देते हुए यह बात रेखांकित की गई कि झारखंड के गोड्डा में कम से कम चार बूथों पर चुनाव अधिकारियों और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच विवाद हुआ। भाजपा कार्यकर्ता मसौदा सूची से नाम हटाने के लिए सामूहिक रूप से फॉर्म जमा कर रहे थे। यह न केवल प्रक्रिया का उल्लंघन है, बल्कि अल्पसंख्यक और वंचित मतदाताओं को सुनियोजित तरीक़े से हटाने की गंभीर साज़िश की ओर इशारा करता है—भले ही वे पीढ़ियों से वहीं रह रहे हों और उनके पास पूरे दस्तावेज़ हों।
प्रक्रिया के ज़रिये मतदाताओं का उत्पीड़न
देशभर में एसआईआर की कार्यप्रणाली से साफ़ है कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची का संशोधन करना कम, बल्कि कमज़ोर, हाशिए के और अल्पसंख्यक वर्ग के मतदाताओं को परेशान करना तथा उन्हें मताधिकार से वंचित करना ज़्यादा है। यह पूरी व्यवस्था नागरिक पर ही अपनी पहचान साबित करने का कठिन बोझ डाल देती है, मुश्किल दस्तावेज़ मांगती है और अव्यावहारिक समय-सीमा तय करके पूरी प्रक्रिया को एक तरह की सज़ा में बदल देती है। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में ज्ञानेश कुमार इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार हैं, जबकि आयोग इस पूरी धांधली पर रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए है।
पश्चिम बंगाल के मामले में केवल कोलकाता तक सीमित क्षेत्राधिकार वाले ट्रिब्यूनल ने नाम बहाली के 7 लाख आवेदनों में से 91% को वैध पाया। इसके बावजूद, मनमाने तर्कों के आधार पर लाखों लोगों को 'विचाराधीन' रखकर अंततः मतदान के अधिकार से वंचित कर देना इस पूरी व्यवस्था को निंदनीय बनाता है।
न्यायपालिका का निराशाजनक रुख़ और आगे का रास्ता
इस पूरे प्रकरण में न्यायपालिका की भूमिका भी निराशाजनक रही है। स्पष्ट आंकड़ों और बिहार में इस प्रक्रिया की गड़बड़ियों को सामने रखने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की कार्रवाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। किसी भी संवैधानिक संस्था के पास नागरिकों के मौलिक अधिकार छीनने या उन्हें प्रक्रिया से बाहर करने का अधिकार नहीं हो सकता।
यदि एक पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया, सभी के लिए समान अवसर और एक स्वतंत्र चुनाव आयोग सुनिश्चित नहीं किया गया, तो देश के लोकतंत्र का भविष्य अंधकारमय है। विपक्षी दलों को एकजुट होकर निष्पक्ष चुनाव और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए ठोस क़दम उठाने की मांग करनी होगी, जिसमें आयोग के शीर्ष पद पर बैठे ज़िम्मेदार अफ़सरों को हटाने की मांग भी शामिल होनी चाहिए।

लेखक सी पी आई (एम)के पोलिटब्यूरो के सदस्य हैं।
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति । 27.09.2026
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