"संस्कृति की स्वायत्तता पर जब-जब तानाशाही का हमला होगा,
तब-तब कला की तूलिका और सड़कों का सत्याग्रह सत्ता की नींव हिलाएगा!"
अकादमी के भगवाकरण के खिलाफ संस्कृति चेतना का इंकलाब: प्रतिरोध की सफेद तूलिका से 6 घंटे के सत्याग्रह तक
कोलकाता। भारत की सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता का ऐतिहासिक 'अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स' इस समय दो परस्पर विरोधी वैचारिक धाराओं के सीधे टकराव का केंद्र बना हुआ है। एक तरफ दक्षिणपंथ की वह आक्रामक सोच है जो अपने मूल चरित्र में अलोकतांत्रिक, असांस्कृतिक और सांप्रदायिक है; दूसरी तरफ बंगाल की वह नैसर्गिक प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष चेतना है जो ज़बरदस्ती थोपे जा रहे वैचारिक वर्चस्व के सामने घुटने टेकने से साफ़ इनकार करती है। अकादमी परिसर में जून से अगस्त तक घटी घटनाओं के पूरे कालानुक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह विवाद केवल एक इमारत के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जन-संस्कृति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धरोहरों की रक्षा का एक साझा नागरिक आंदोलन बन चुका है।
घटनाक्रम का संपूर्ण कालानुक्रम (Chronological Timeline)
28 जून: भगवाकरण की साजिश और बेदखली की शुरुआत
अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स केवल ईंट-गारे का ढांचा नहीं, बल्कि शंभू मित्र, 'बहुरूपी' नाट्य दल और बंगाल के जनवादी आंदोलनों की ऐतिहासिक विरासत है। राज्य की सत्ता संरचना में हुए बदलावों का अनुचित लाभ उठाकर आरएसएस-भाजपा समर्थित उपद्रवियों ने 28 जून को परिसर में घुसकर यूनियन के दावों से जुड़े पोस्टर व डिस्प्ले फाड़ डाले। इसके साथ ही टिकट काउंटर से सटे सुरक्षाकर्मियों के कमरे पर कब्जा कर रातोरात उसे भगवा रंग में पोत दिया गया और वहां रहने वाले कर्मचारियों (जिनमें हिंदू व मुस्लिम दोनों सुरक्षाकर्मी शामिल थे) का सामान व धार्मिक प्रतीक बाहर फेंक दिए गए।
"सत्ता के दम पर इमारतों के रंग तो बदले जा सकते हैं, लेकिन जन-संस्कृति की आत्मा का रंग बदलना फासीवादी सनक के बस की बात नहीं!"
11 जुलाई: नाट्यकर्मियों का पहला विरोध और भाजपा का छल
इस सांस्कृतिक अतिक्रमण के खिलाफ 11 जुलाई को चंदन सेन, मेघनाद भट्टाचार्य, अरुण मुखोपाध्याय, बिभास चक्रवर्ती, अशोक मुखोपाध्याय, सीमा मुखोपाध्याय, अरूप रॉय और सौरव पालधी समेत शीर्ष नाट्यकर्मियों ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य को पत्र सौंपकर कड़ा विरोध जताया। मुलाकात के दौरान शमीक भट्टाचार्य ने घटना में अपनी पार्टी की संलिप्तता से इनकार किया और 15 दिनों के भीतर पुराना मूल सफेद रंग बहाल कराने का आश्वासन दिया था।
18 जुलाई: प्रतिरोध सभा और 'आदाब' नाटक पर उपद्रव
भाजपा के आश्वासन के बावजूद कोई कदम न उठाए जाने पर 18 जुलाई को अकादमी परिसर में कलाकारों, बुद्धिजीवियों और ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों की एक बड़ी विरोध सभा आयोजित हुई। सभा में वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने स्पष्ट चेतावनी दी:
"यदि तीन दिनों के भीतर यह भगवा अतिक्रमण नहीं हटाया गया, तो जनता को साथ लेकर हम खुद इसका रंग बदल देंगे।" संदर्भ देखें
इसी दौरान दक्षिणपंथी ताकतों की असहिष्णुता का एक और बर्बर चेहरा सामने आया, जब बाघाजतिन स्थित शिखा गुह भवन में समरेश बसु की प्रसिद्ध कहानी 'आदाब' पर आधारित नाटक के मंचन के दौरान अजान की ध्वनि सुनकर आरएसएस के उपद्रवियों ने भारी हंगामा किया और कलात्मक प्रस्तुति पर धार्मिक पाबंदी लगाने की कोशिश की।
28 जुलाई: अभिनेता शुभंकर दासशर्मा पर सांप्रदायिक हमला
'जनगणमन' नाट्य संस्था के अभिनेता शुभंकर दासशर्मा पर 28 जुलाई की रात श्यामनगर स्टेशन के पास 4 बदमाशों ने बर्बर हमला किया। नाटक के पात्र की आवश्यकता के कारण वे मुस्लिम परिधान में थे। उपद्रवियों ने उन्हें मुसलमान समझकर पीटा, जिससे उनके चेहरे और कान पर गंभीर चोटें आईं। नोआपारा पुलिस ने इस मामले में टालमटोल की नीति अपनाई । शुभंकर ने कहा, "संविधान के अनुसार किसी नागरिक को धर्म की आड़ लेकर जीवित रहने की मजबूरी नहीं है; हिंदू-मुस्लिम सभी को जीने का समान अधिकार है।"
11 अगस्त: नाट्यकर्मियों ने खुद उठाई तूलिका, लौटाया मूल सफेद रंग
भाजपा के वादे के एक महीने बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो 11 अगस्त को दोपहर 3 बजे नाट्यकर्मियों और नागरिक समाज ने स्वयं मोर्चा संभाला। राणुछाया मंच पर प्रदर्शन के बाद पुलिस की मौजूदगी में कलाकारों ने खुद हाथों में ब्रश उठाकर दीवारों को दोबारा उसके ऐतिहासिक मूल सफेद रंग में वापस लौटा दिया।
हाथ में ब्रश थामकर प्रतिरोध दर्ज कराने पहुँचे वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि कानूनन किसी धरोहर संस्थान में मनमर्जी से बदलाव नहीं किया जा सकता। वहीं, नाटककार चंदन सेन ने स्पष्ट किया कि वे शमीक बाबू (भाजपा प्रदेश अध्यक्ष) के पास दया की भीख मांगने नहीं, बल्कि अपना अधिकार लेने गए थे। इस अभियान में मेघनाद भट्टाचार्य, अरुण मुखोपाध्याय, बिभास चक्रवर्ती, अशोक मुखोपाध्याय, अरूप रॉय, सौरव पालधी, बिमल चक्रवर्ती, सौमित्र बासु, देवाशीष मजुमदार, जयराज भट्टाचार्य और वामपंथी आंदोलन के वरिष्ठ नेता शमीक लाहिड़ी समेत दर्जनों गणमान्य लोग शामिल हुए।
12 अगस्त: रुद्रनील घोष की अगुवाई में दोबारा हमला व धमकियां
11 अगस्त को रंग बहाल होने के महज 24 घंटे बाद, 12 अगस्त को भाजपा विधायक/नेता रुद्रनील घोष के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ता बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के अकादमी में घुसे। उन्होंने कॉन्फ्रेंस रूम में बैठक की, 'जय श्री राम' के नारे लगाए और सफेद रंग के ऊपर दोबारा भगवा रंग पोत दिया। संदर्भ देखें
रुद्रनील घोष ने धमकी दी कि "अकादमी में लाल झंडा नहीं फहराएगा" और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य को खुलेआम चेतावनी दी कि "देखा जाएगा कि विकास बाबू कोर्टरूम के किस कमरे में नाटक का अभ्यास करते हैं।" इतना ही नहीं, उस कमरे के अंदर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तस्वीरें टांगकर संस्था पर राजनीतिक कब्जा जमाने का नंगा प्रदर्शन किया गया।
इस अराजकता का बेबाकी से जवाब देते हुए नाटककार सीमा मुखोपाध्याय ने कहा:
"अगर सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं ने रंग बदलने का काम नहीं किया था, तो शमीक भट्टाचार्य एक रात में यह रंग हटवा सकते थे। इन्हें समझना चाहिए कि थियेटर कर्मियों को इतनी आसानी से पालतू नहीं बनाया जा सकता।"
20 अगस्त: पुलिसिया बाधाओं को ठुकराकर 6 घंटे का ऐतिहासिक सत्याग्रह
12 अगस्त की गुंडागर्दी के खिलाफ 20 अगस्त (गुरुवार) को नाट्यकर्मियों ने दोपहर 2 बजे से रात 8 बजे तक अकादमी परिसर में राणुछाया मंच के पास 6 घंटे का अनवरत धरना और प्रदर्शन आयोजित किया।
"जब-जब पुलिस प्रशासन हुक्मरानों का औजार बनेगा, तब-तब कला की तूलिका और सड़कों का सत्याग्रह सत्ता की चूले हिलाएगा!"
प्रशासनिक सांठगांठ का आलम यह रहा कि हेस्टिंग्स थाने की पुलिस ने 'अन्य कार्यक्रम' का झूठा बहाना बनाकर बुधवार और बृहस्पतिवार दोनों दिन अनुमति देने में रोड़े अटकाए। नाट्यकर्मी सीमा मुखोपाध्याय ने इस पुलिसिया सांठगांठ को बेनकाब करते हुए कहा कि पुलिस के मनगढ़ंत बहानों के बावजूद रंगकर्मी पीछे हटने वाले नहीं हैं। धरने में बीमल चक्रवर्ती, अरूप रॉय, सौमित्र बासु, देवाशीष मजुमदार और पीड़ित अभिनेता शुभंकर दासशर्मा सहित अनेक संस्कृतिकर्मी डटे रहे।
इतिहास मिटाने का संघी पैटर्न: धरोहरों पर संगठित हमला
भाजपा के राजनीतिक उभार के बाद से पश्चिम बंगाल में नए सिरे से सांस्कृतिक आक्रामकता और हिंसक हमलों का भयावह पैटर्न देखा जा रहा है। अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स पर बार-बार किया जा रहा यह हमला कोई छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि यह दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा जन-संस्कृति, इतिहास और प्रगतिशील प्रतीकों को मिटाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है:
जियागंज में लेनिन की मूर्ति ढहाया जाना: मुर्शिदाबाद के जियागंज में क्रांतिकारी जननायक लेनिन की प्रतिमा को ध्वस्त करके अपनी वैचारिक असहिष्णुता का प्रदर्शन किया गया। संदर्भ देखें।
रानीगंज में राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा गायब होना: रानीगंज में महान विचारक और महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा को गायब कर दिया गया, जो इस बात का प्रमाण है कि दक्षिणपंथ बौद्धिक विरासत से कितना भयभीत है। संदर्भ देखें
मानो सत्ता को असभ्यता का दौरा पड़ा है: न्यू अलीपुर में नेताजी की मूर्ति का हाथ तोड़े जाने की घटना का असर अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि कूचबिहार के माथाभांगा में विद्रोही कवि काजी नजरूल इस्लाम की अर्धप्रतिमा (बस्ट) से चश्मा गायब हो गया। नदिया के ताहेरपुर में उपद्रवियों ने बिरसा मुंडा और डॉ. बी.आर. अंबेडकर की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया। पुलिस अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। संदर्भ देखें
वैचारिक निष्कर्ष: सांस्कृतिक हीनता-ग्रंथि और अनवरत आंदोलन
दक्षिणपंथ के पास जन-संस्कृति, प्रगतिशील साहित्य और रचनात्मक सृजन का कोई समृद्ध इतिहास नहीं है। इसी सांस्कृतिक हीनता-ग्रंथि (Cultural Inferiority Complex) के कारण वे संवाद का मुकाबला नहीं कर पाते और इमारतों पर जबरन रंग पोतने, मूर्तियाँ तोड़ने तथा कलाकारों पर हमले करने जैसी हरकतें करते हैं। यदि आज नागरिक समाज और प्रगतिशील ताकतें पीछे हट गईं, तो कल नाटकों की पटकथाओं को सेंसर किया जाएगा, जनवादी साहित्य पर पाबंदियाँ लगेंगी और नागरिकों से उनके सोचने-बोलने की आज़ादी छीन ली जाएगी।
"जहाँ तर्क और रचनात्मकता खत्म होती है, वहीं से फासीवाद की लाठी और भगवा रंगबाजी शुरू होती है!"
गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर, काजी नज़रुल इस्लाम, शंभू मित्र और सत्यजीत रे की इस माटी में, जहाँ गुरुदेव ने 'गीतांजलि' में भयमुक्त चित्त और स्वतंत्र ज्ञान का संदेश दिया था, ज़बरदस्ती थोपा गया कोई भी एकरंगी फासीवाद टिक नहीं सकता। नाट्यकार सीमा मुखोपाध्याय, अरूप रॉय और नागरिक समाज के दिग्गजों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अकादमी में रंग बदलने और धमकियों के खिलाफ एक व्यापक राज्यव्यापी आंदोलन की रणनीति तय करेंगे। नागरिक समाज, युवा, छात्र और जन-संगठन इस वैचारिक तानाशाही के पूर्ण अंत तक अपना संघर्ष जारी रखेंगे!
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