मजदूरों के हित में संघर्ष अपराध नहीं है। अन्याय के खिलाफ सवाल उठाना अपराध नहीं है। लोकतंत्र के पक्ष में बोलना अपराध नहीं है। न्याय की मांग अपराध नहीं है।
आकृति—उम्मीद मत हारना। तुम्हारे पिता ने कहा है कि उन्हें गर्व है—उनकी बेटी मजदूरों के अधिकारों के पक्ष में आवाज उठा रही थी। उस आवाज उठाने के अधिकार को जीवित रहना चाहिए।
"आकृति चौधरी-पश्चिम बर्धमान के दुर्गापुर की एक और अग्निकन्या"
*गौरांग चटर्जी*
आज सवाल सिर्फ आकृति चौधरी का नहीं है। आज सवाल इस देश के मजदूर का, छात्र का, नागरिक का—और सबसे बढ़कर हमारे लोकतंत्र के भविष्य का है। आकृति चौधरी पश्चिम बर्धमान के दुर्गापुर के एक साधारण परिवार की बेटी हैं। पिता अरुण चौधरी हैं, जो हमारे दुर्गापुर के गणशक्ति प्रेस के एक कर्मी हैं।

दुर्गापुर के केंद्रीय विद्यालय (CMERI) से उच्च माध्यमिक, दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज से इतिहास में स्नातक, और उसी विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर। यूजीसी-नेट (UGC-NET) उत्तीर्ण आकृति पीएचडी में प्रवेश की आवेदन प्रक्रिया में थीं और साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय में एलएल.बी. (LL.B.) प्रथम वर्ष की छात्रा भी हैं। एक मेधावी, अध्ययनशील, भविष्य के सपने देखने वाली युवती—आज एक विचाराधीन मामले में जेल में है। नोएडा के मजदूर आंदोलन को लेकर हिंसा भड़काने, मजदूरों को संगठित करके जन-श्रृंखला (पब्लिक ऑर्डर) को बाधित करने जैसे आरोपों में आकृति चौधरी और सत्यम वर्मा के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और बाद में उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लागू किया गया। आरोप गंभीर हैं। लेकिन आरोप का मतलब अपराध सिद्ध होना नहीं है। इन आरोपों की सत्यता अदालत ही तय करेगी। एक लोकतांत्रिक देश में यही कानून का रास्ता है, यही संविधान का रास्ता है। लेकिन सवाल फिर भी उठता है—क्या सवाल पूछना अपराध है?
आकृति के पिता अरुण चौधरी ने मीडिया में एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाया है—यदि उनकी बेटी को 11 अप्रैल को हिरासत में लिया गया था, तो 13 अप्रैल को हुई हिंसा की "मुख्य साजिशकर्ता" या "उकसाने वाली" के रूप में उसे कैसे आरोपी बनाया जा रहा है? इस सवाल का जवाब जाँच और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही स्पष्ट होना चाहिए। लेकिन यह सवाल पूछने का अधिकार एक पिता को है, एक नागरिक को है, हममें से हर एक को है। और उसी न्यायिक प्रक्रिया में और भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आकृति पर लगाए गए NSA के तहत हिरासत के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने राज्य द्वारा पेश किए गए घटनाक्रम, दस्तावेजों और हिरासत की प्रक्रिया की विसंगतियों पर कड़े सवाल उठाए हैं। यहां तक कि सरकार की कहानी को "concocted story"—यानी मनगढ़ंत या बनाई गई कहानी—करार दिया है। यानी अदालत ने कम से कम NSA के तहत उन्हें हिरासत में रखने के लिए राज्य द्वारा दिए गए आधारों को स्वीकार्य नहीं माना। लगभग पाँच महीने एक युवती जेल में रही। पाँच महीने—किसी इंसान की जिंदगी का कितना कीमती समय! क्या वह समय वापस लौटाया जा सकता है? क्या लौटाई जा सकती है उसकी पढ़ाई की स्वाभाविक लय, रिसर्च के सपने, भविष्य की योजनाएं और परिवार के साथ बिताए दिन? अदालत ने मुआवजे का निर्देश दिया है। लेकिन क्या पैसा हर नुकसान की भरपाई कर सकता है?
आकृति के पिता ने यह भी कहा है कि यदि किसी विशेष राजनीतिक या वैचारिक विचारधारा को निशाना बनाया जा रहा है, तो उस विचारधारा के कुछ अंशों में वे खुद भी विश्वास रखते हैं। उनका सवाल है—"उन विचारों में विश्वास रखने में क्या बुराई है?" उन्होंने आगे कहा—"मुझे गर्व है कि मेरी बेटी मजदूरों के अधिकारों के पक्ष में आवाज उठा रही थी।" जेल में बेटी से मुलाकात के अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि आकृति अभी भी मानसिक रूप से मजबूत है। हर बार मिलने पर वह अपने पिता से कहती है—"उम्मीद मत हारना।" जबकि उस मुलाकात के दौरान इतनी सख्त सुरक्षा होती है कि उन्हें लगता है जैसे उनकी संतान कोई भयानक आतंकवादी हो। एक पिता की यह पीड़ा क्या सिर्फ एक परिवार की पीड़ा है? या यह हमारे दौर का एक गहरा मानवीय सवाल है? इसलिए आज सवाल है—क्या मजदूरों के साथ खड़े होना अपराध है? क्या उचित मजदूरी की बात करना अपराध है? क्या सुरक्षित काम के परिवेश की मांग करना अपराध है? क्या संगठन बनाना अपराध है? क्या अन्याय के खिलाफ सवाल करना अपराध है? क्या लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में खड़ा होना अपराध है?
निश्चित रूप से, यदि किसी के खिलाफ हिंसा या अपराध के ठोस सबूत हैं, तो उस पर मुकदमा चलना चाहिए। लेकिन वह न्याय कानून के दायरे में, सबूतों के आधार पर, निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया से हो। किसी व्यक्ति को केवल किसी आंदोलन से जुड़े होने के कारण अपराधी बना देना जितना अस्वीकार्य है, उतना ही किसी गम्भीर अपराध के आरोप को केवल राजनीतिक पहचान के कारण खारिज भी नहीं किया जा सकता। कानून की नजर में दोनों पहलू समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। लोकतंत्र की असली परीक्षा यहीं है। लोकतंत्र सिर्फ पाँच साल में एक दिन वोट देने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का मतलब है सवाल पूछने का अधिकार, संगठित होने का अधिकार, विरोध करने का अधिकार, असहमति व्यक्त करने का अधिकार और राज्य की शक्ति के सामने भी अपने अधिकारों के साथ खड़े होने का साहस।
कार्ल मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष की बात कही है। मजदूरों का संघर्ष केवल मजदूरी बढ़ाने की मांग नहीं है; इसके साथ जुड़ा है मनुष्य का सम्मान, संगठन का अधिकार, सामाजिक न्याय और प्रतिष्ठा का अधिकार। इतिहास में कई लोग मजदूरों के साथ खड़े होकर राज्य, पूँजी और सत्ता के विभिन्न रूपों के प्रतिरोध के सामने आए हैं। फिर भी उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सका। क्योंकि किसी एक व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल आखिरकार पूरे समाज की स्वतंत्रता का सवाल बन जाता है।
हम भूल नहीं सकते—जेल इंसान के शरीर को कैद कर सकती है, लेकिन एक जायज सवाल को हमेशा के लिए कैद नहीं रख सकती। जिस आवाज को आज खामोश करने की कोशिश की जा रही है, इतिहास के किसी मोड़ पर वही आवाज लोगों के क्षअधिकारों की भाषा बन सकती है।
आकृति चौधरी और इस मामले में गिरफ्तार अन्य लोगों के खिलाफ लगाए गए आरोप अदालत के समक्ष विचाराधीन हैं। अदालत ही सच और झूठ का फैसला करेगी। हम पहले से किसी को दोषी या निर्दोष घोषित नहीं कर रहे हैं। हम सिर्फ इतना चाहते हैं—पारदर्शी और निष्पक्ष जाँच हो, उचित न्याय हो, कानून का सही लागूकरण हो और हर आरोपी के संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
क्योंकि आज जो अधिकार हम आकृति के लिए मांग रहे हैं, कल वही अधिकार शायद मेरे लिए भी जरूरी हो सकता है। आज जो सवाल एक मजदूर पूछ रहा है, कल वही सवाल शायद आपका बच्चा पूछेगा। आज जो छात्र विरोध कर रहा है, कल वही सवाल शायद हमारे घर के दरवाजे पर आ खड़ा होगा।
इसलिए यह सवाल किसी एक पार्टी, किसी एक विचारधारा या किसी एक व्यक्ति का सवाल नहीं है। यह अधिकारों का सवाल है। यह संविधान का सवाल है। यह न्याय का सवाल है।
हम एक ऐसा समाज चाहते हैं, जहाँ मजदूर की मांग सुनने के लिए लाठी नहीं, संवाद हो; डर नहीं, लोकतांत्रिक चर्चा हो; अभिव्यक्ति को साजिश के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीवन-शक्ति के रूप में देखा जाए। हम एक ऐसा राज्य चाहते हैं, जहाँ कानून के शासन का अर्थ हो निष्पक्ष प्रक्रिया, समान अधिकार और हर व्यक्ति की गरिमा के प्रति अटूट सम्मान।
मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं है। दया की नहीं—अधिकार की। बदले की नहीं—न्याय की। खामोशी की नहीं—संवाद की। डर की नहीं—लोकतंत्र की। क्योंकि किसी राज्य की वास्तविक ताकत उसकी जेल की दीवारें कितनी ऊँची हैं, इसमें नहीं; बल्कि उसके न्याय की बुनियाद कितनी मजबूत है, इसमें है। एक लोकतंत्र की गरिमा इसमें नहीं है कि कितने लोगों को कैद किया गया है; बल्कि इसमें है कि वह कितने साहस के साथ असहमति सुन सकता है, कितनी ईमानदारी से कानून लागू कर सकता है और कितनी निष्ठा से मानवीय अधिकारों की रक्षा कर सकता है।
मजदूरों के हित में संघर्ष अपराध नहीं है। अन्याय के खिलाफ सवाल उठाना अपराध नहीं है। लोकतंत्र के पक्ष में बोलना अपराध नहीं है। न्याय की मांग अपराध नहीं है।
आकृति—उम्मीद मत हारना। तुम्हारे पिता ने कहा है कि उन्हें गर्व है—उनकी बेटी मजदूरों के अधिकारों के पक्ष में आवाज उठा रही थी। उस आवाज उठाने के अधिकार को जीवित रहना चाहिए।
जेल की दीवारें चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न हों, वे इंसान के न्याय की आकांक्षा से ऊँची नहीं हो सकतीं।
● मजदूरों के अधिकार।
● नागरिकों के अधिकार।
● संविधान के अधिकार।
● लोकतंत्र के अधिकार।
यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं है—यह लड़ाई न्याय के पक्ष में बोलने के अधिकार को बचाए रखने की लड़ाई है।
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(लेखक CPIM पश्चिम बर्धमान जिला के सचिव हैं)
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