वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
बुधवार, 30 सितंबर 2026 | Wednesday, 30 September 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंराष्ट्रीय

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

राष्ट्रीय

कॉमरेड सोन्या गिल: समानता और न्याय के लिए समर्पित एक जीवन ~ मरियम धावले

केशव कुमार भट्टड़•04 सितंबर 20268 मिनट पठन139 बार पढ़ा गया

कॉमरेड सोन्या गिल, लाल सलाम! कॉमरेड सोन्या गिल अमर रहें.!.
कॉमरेड सोन्या गिल का निधन महाराष्ट्र और मुंबई के महिला आंदोलन और वामपंथी आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति है। जेएनयू से समाजशास्त्र में उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त करने वाली सोन्या जी ने अपना पूरा जीवन वर्ली, जीजामाता नगर जैसी मजदूर बस्तियों में महिलाओं को संगठित करने और जन-स्वास्थ्य के मुद्दों पर ऐडवा (AIDWA) व सीपीआई (एम) के माध्यम से संघर्ष करने में समर्पित कर दिया। वह 'पारी' (PARI) की सह-संस्थापक थीं और पी. साईनाथ के साथ उनका दाम्पत्य अटूट वैचारिक एकता से भरा रहा। गंभीर बीमारी और असह्य दर्द के बावजूद उन्होंने अंतिम समय तक जन-संघर्षों में हिस्सा लिया। उनका जीवन, साहस और विचार आने वाली पीढ़ियों के सामाजिक परिवर्तन और न्याय के संघर्षों को सदैव प्रेरित करते रहेंगे।

कॉमरेड सोन्या गिल: समानता और न्याय के लिए समर्पित एक जीवन ~ मरियम धावले


संघर्ष, सेवा व चेतना का प्रतीक
कॉमरेड सोन्या गिल: 'समानता और न्याय के लिए समर्पित एक जीवन'

-मरियम धावले


कॉमरेड सोन्या गिल: वामपंथी आंदोलन व महिला चेतना के एक मजबूत और अविस्मरणीय स्तंभ का अचानक अंत।

25 अगस्त, 2026 को 71 वर्ष की आयु में कॉमरेड सोन्या गिल का अचानक और दुखद निधन मुंबई और महाराष्ट्र में महिला आंदोलन और वामपंथी आंदोलन के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। उन्हें एक कॉमरेड और दोस्त के रूप में प्यार और सम्मान देने वाले सभी लोगों के लिए यह एक गहरा आघात है। सोन्या गिल लंबे समय से सीपीआई (एम) की महाराष्ट्र राज्य समिति और मुंबई जिला सचिवालय की सदस्य थीं, लगभग दो दशकों तक एडवा (AIDWA) की केंद्रीय कार्यकारी समिति की सदस्य रहीं, 2010 से 2019 तक तीन कार्यकालों के लिए एडवा की महाराष्ट्र राज्य महासचिव और बाद में राज्य उपाध्यक्ष रहीं। अपने पति और प्रसिद्ध पत्रकार पी. साईनाथ के साथ, वह 'पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया' (PARI) की सह-संस्थापक और ट्रस्टी भी थीं।

कॉमरेड सोन्या गिल: उत्कृष्ट शिक्षा, समाजशास्त्र की समझ और जेएनयू से मिली वैचारिक दिशा का अनूठा सफर।

सोन्या एक पंजाबी सिख परिवार से थीं। उनके पिता सेना में अधिकारी थे और माँ एक गृहिणी थीं। सोन्या का जन्म 27 सितंबर, 1955 को हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा दिल्ली के मेटर देई स्कूल से प्राप्त की, जहाँ उन्होंने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, बल्कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ ऑलराउंडर भी घोषित किया गया था। उन्होंने पुणे के एस. पी. कॉलेज से स्नातक किया। 1976 से 1980 के बीच, उन्होंने दिल्ली के जेएनयू से समाजशास्त्र में एमए और एमफिल की डिग्री प्राप्त की और दोनों में 'ए' ग्रेड हासिल किया। जेएनयू में ही उनका परिचय वामपंथी विचारधारा से हुआ। इसके बाद 1981-82 में एक वर्ष के लिए उन्होंने मुंबई के सोफिया कॉलेज में समाजशास्त्र पढ़ाया और फिर 'फाउंडेशन फॉर रिसर्च इन कम्युनिटी हेल्थ' (FRCH) में काम किया। स्वास्थ्य हमेशा से उनकी रुचि और अध्ययन के महत्वपूर्ण विषयों में से एक रहा।

कॉमरेड सोन्या गिल: अकादमिक प्रतिभा और जन-स्वास्थ्य के अध्ययन का वामपंथी विचारधारा से गहरा जुड़ाव।

सोन्या 1989 में एडवा में शामिल हुईं और महिला आंदोलन में सक्रिय हो गईं। उन्होंने अहिल्या रांगणेकर और प्रभा सावंत के मार्गदर्शन में मध्य मुंबई के मज़दूर वर्ग के इलाकों, जैसे वर्ली बीडीडी चॉल, जीजामाता नगर और डेलिसल रोड में महिलाओं के बीच अपना काम शुरू किया। 1994 में उन्हें एडवा मुंबई जिला समिति की अध्यक्ष चुना गया। इस पद पर रहते हुए, उन्होंने पूरे शहर में एडवा की स्थानीय इकाइयों के निर्माण पर बहुत बारीकी से ध्यान दिया। उन्होंने मुंबई में अन्य धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील महिला संगठनों के साथ संयुक्त गतिविधियों को खड़ा करने के भी विशेष प्रयास किए। वह अंत तक मुंबई एडवा का एक मजबूत स्तंभ बनी रहीं। बाद में उन्हें एडवा की महाराष्ट्र राज्य समिति, फिर इसके राज्य सचिवालय और अंततः 2010 में राज्य महासचिव के रूप में चुना गया। उन्होंने 2019 तक तीन कार्यकालों के लिए इस जिम्मेदारी को पूरी कुशलता से निभाया। उन्होंने कई जिलों का व्यापक दौरा किया और संगठन को मजबूत करने में मदद की। 2007 से 2023 तक वह एडवा की केंद्रीय कार्यकारी समिति (CEC) के लिए भी चुनी गईं। प्रजनन स्वास्थ्य, जनसंख्या नीतियों और अन्य स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर चर्चा में उनका योगदान बेहद मूल्यवान था। इससे एडवा को राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य के मुद्दों पर अपना रुख तय करने में मदद मिली। सोन्या ने जन स्वास्थ्य अभियान (JSA) में एडवा का प्रतिनिधित्व किया और इसके अभियानों में जेंडर (लैंगिक) दृष्टिकोण को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सोन्या ने महिला कार्यकर्ताओं के वैचारिक और राजनीतिक प्रशिक्षण पर भी बहुत बारीकी से ध्यान दिया। राजनीतिक रूप से जागरूक, आत्मविश्वासी और स्वतंत्र महिला कार्यकर्ताओं का विकास करना उनके लिए सबसे अहम था। सोन्या 1990 में सीपीआई (एम) में शामिल हुईं; 1997 में सीपीआई (एम) मुंबई जिला समिति, 2005 में जिला सचिवालय और 2012 में महाराष्ट्र राज्य समिति के लिए चुनी गईं।

29 मार्च, 1986 को सोन्या का विवाह पी. साईनाथ से हुआ। जेएनयू में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात हुई थी। चार दशकों की उनकी असाधारण रूप से मजबूत व्यक्तिगत और राजनीतिक साझेदारी 25 अगस्त को एक शाम की सैर के दौरान अचानक तब समाप्त हो गई, जब सोन्या अचानक गिर पड़ीं। हममें से किसी ने भी सोन्या के अंतिम संस्कार के दिन साईनाथ को इतना टूटा हुआ पहले कभी नहीं देखा था। PARI में उनका योगदान बहुत बड़ा था, और वह अपने आप में एक अलग वृत्तांत का हकदार है।

कॉमरेड सोन्या गिल: गंभीर बीमारी और असह्य दर्द के बावजूद काम के प्रति अटूट निष्ठा और मुस्कान।

सोन्या ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी गंभीर बीमारी का शानदार साहस के साथ मुकाबला किया। उस दौर में वह और साईनाथ किन परिस्थितियों से गुज़रे, उसे शब्दों में कभी बयान नहीं किया जा सकता। लेकिन इस सबके बावजूद, उनकी प्रतिबद्धता, उनकी गरिमा और उनकी उज्ज्वल मुस्कान ने एक बार भी उनका साथ नहीं छोड़ा। उनके मुँह से कभी उनके दर्द या कठिनाइयों के बारे में एक शब्द भी नहीं सुना गया। पी. साईनाथ कहते हैं, "यह बात घर पर भी सच थी। 40 सालों में, मैंने कभी उन्हें अपने स्वास्थ्य या अपने दर्द के बारे में शिकायत करते हुए या अपना दुखड़ा रोते हुए नहीं सुना। वह हर बार बेहद सकारात्मक रहती थीं और हर बड़ी सर्जरी के बाद काम पर लौट आती थीं, पहले ऑनलाइन और फिर ऑफिस में।" वह अंत तक, यहाँ तक कि 10 अगस्त, 2026 को मुंबई में देशव्यापी 'जेल भरो' संघर्ष तक, एडवा और सीपीआई (एम) की गतिविधियों में पूरी तरह भाग लेती रहीं। यह सब सर्वोच्च स्तर का साहस और दृढ़ निश्चय था।

कॉमरेड सोन्या गिल: 32 वर्षों के साथ काम, आंदोलनों के रोमांच और अडिग साहस की प्रेरणादायक यादें।

मैंने 1994 में एसएफआई (SFI) से कार्यमुक्त होने के बाद महिला आंदोलन में कदम रखा था और तब से सोन्या और मैंने 32 वर्षों तक एडवा में एक साथ काम किया। हमने सभी स्तरों पर एक साथ मिलकर काम किया, और एक कार्यकाल के लिए महाराष्ट्र एडवा के अध्यक्ष और महासचिव के रूप में भी साथ रहीं। उनके साथ काम करना एक सुखद अनुभव था। विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस का सामना करते हुए उनके अडिग साहस को देखना प्रेरणादायक था। यह बहुत ही रोमांचक होता था जब हम अखिल भारतीय रैलियों के लिए सैकड़ों महिलाओं के साथ मुंबई से दिल्ली तक बिना टिकट यात्रा करते थे। ट्रेन में गीत, नारे और हँसी गूँजती थी। सोन्या आसानी से ट्रेन में महिलाओं की भीड़ में घुल-मिल जाती थीं और एक सामूहिक ताकत का हिस्सा बन जाती थीं।

कॉमरेड सोन्या गिल: स्थानीय समस्याओं को वर्गीय शोषण, जाति और पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई से जोड़ने की सीख।

सोन्या सही मायनों में एक ज़मीनी स्तर की आयोजक थीं। उनकी राजनीति आम लोगों, विशेषकर मज़दूर वर्ग की महिलाओं के जीवन और संघर्षों से गहराई से जुड़ी थी। उन्होंने लगन से महिलाओं के स्थानीय मुद्दों को उठाया, संघर्षों को संगठित किया और उन्हें कार्रवाई के लिए लामबंद किया। इससे महिलाओं को अपनी ताकत का एहसास हुआ और वे मुंबई की विभिन्न बस्तियों में अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाने में सक्षम बनीं। दशकों तक, उन्होंने समानता, गरिमा और न्याय के लिए महिलाओं के सामूहिक संघर्षों को मजबूत करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। उन्होंने हमेशा युवा कॉमरेड्स को महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं के पीछे की व्यापक राजनीतिक और आर्थिक ताकतों को समझने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पानी, राशन, आवास, शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य और हिंसा के संघर्षों को वर्गीय शोषण, जातीय उत्पीड़न और पितृसत्ता के खिलाफ व्यापक संघर्ष से जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने सांप्रदायिक और जातिवादी ताकतों का कड़ा विरोध किया और महिलाओं की एकता पर ज़ोर दिया।


कॉमरेड सोन्या गिल: आम लोगों और मजदूर वर्ग की महिलाओं के हकों के लिए समर्पित एक जमीनी नेता।

सोन्या वैचारिक दृढ़ता और व्यक्तिगत आत्मीयता का एक असाधारण संगम थीं। उनका शांत दृढ़ निश्चय और दूसरों को प्रोत्साहित करने की उनकी क्षमता अनुकरणीय थी। उन्होंने कभी सुर्खियों में रहने की चाह नहीं रखी। उनकी संतुष्टि अन्य महिलाओं को आत्मविश्वासी नेताओं के रूप में उभरते देखने से मिलती थी। उन्हें आम महिलाओं की अपने स्वयं के जीवन और समाज को बदलने की क्षमता पर पूरा विश्वास था। उनका निधन एक गहरा शून्य छोड़ गया है। लेकिन सोन्या को सच्ची श्रद्धांजलि केवल दुख के शब्द नहीं हो सकते; इसका अर्थ उस कार्य को आगे बढ़ाना होना चाहिए जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसका अर्थ महिला आंदोलन को मजबूत करना, शोषितों और उत्पीड़ितों के संघर्षों का निर्माण करना, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा करना तथा सांप्रदायिकता, जातिवाद और पितृसत्ता के खिलाफ लड़ना होना चाहिए।

कॉमरेड सोन्या गिल: सामाजिक परिवर्तन, समानता और न्याय के हर जन-संघर्ष में सदैव जीवित रहेगी उनकी विरासत।

कम्युनिस्ट कॉमरेड सोन्या ने कभी भी महिलाओं की मुक्ति को आमूल-चूल सामाजिक परिवर्तन से अलग नहीं किया। वह समझती थीं कि क्रांतिकारी कार्यों के लिए धैर्य, अनुशासन और त्याग की आवश्यकता होती है। वह अपने पीछे केवल यादें ही नहीं, बल्कि महिला कार्यकर्ताओं का एक समृद्ध सामूहिक दल भी छोड़ गई हैं। एडवा, सीपीआई (एम), PARI और अनगिनत कॉमरेड्स और दोस्तों द्वारा उनकी कमी हमेशा गहराई से महसूस की जाएगी। लेकिन उनकी विरासत वहाँ जीवित रहेगी जहाँ महिलाएँ संगठित होंगी, जहाँ मज़दूर और किसान अपनी मुट्ठियाँ तानेंगे, और जहाँ लोग एक न्यायपूर्ण और समान समाज के लिए संघर्ष करेंगे!

कॉमरेड सोन्या गिल, लाल सलाम!

कॉमरेड सोन्या गिल अमर रहें!





मरियम धावले
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की पोलिट ब्यूरो की सदस्य हैं।
अखिल भारतीय लोकतांत्रिक महिला संघ (ऐडवा) की महासचिव हैं।




साभार: People's Democracy. 31 अगस्त-6 सितंबर 2026

अपलोडर: VKA-FD9RRG

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

कॉमरेड सोन्या गिल: समानता और न्याय के लिए समर्पित एक जीवन ~ मरियम धावले

अपलोडर: VKA-FD9RRG • प्रकाशित: 04 सितंबर 2026 • 8 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

356 क्लिक

2

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

354 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

334 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

330 क्लिक

5

'बदलाव का कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता - गणेश शंकर विद्यार्थी।' अनीश अंकुर की कलम से

324 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
राष्ट्रीय

भारतीय न्यायपालिका और चुनाव आयोग की साख पर उठे प्रश्न

"न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए - क्या हमारा लोकतंत्र इस कसौटी पर खरा उतर रहा है?" प्रस्तुत विश्लेषण भारतीय न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग जैसी शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं में गहराते 'हितों के टकराव'और संस्थागत क्षरण पर चिंता व्यक्त करता है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा द्वारा चुनाव आयोग से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करना - जबकि उनके पुत्र आयोग के स्थायी वकील हैं - न्यायिक शुचिता और रोस्टर नियमों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इसी दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त की आईएएस बेटी को हाईकोर्ट के दंडात्मक आदेश से सुप्रीम कोर्ट द्वारा त्वरित राहत मिलना और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका का अनिश्चितकाल के लिए टल जाना व्यवस्थागत पक्षपात की ओर इशारा करता है। यह पूरा घटनाक्रम यह दर्शाता है कि कार्यपालिका (सरकार) के बढ़ते प्रभाव और प्रक्रियागत कमियों के कारण देश 'नियंत्रित लोकतंत्र' और संवैधानिक संतुलन के कमजोर होने की दिशा में बढ़ रहा है।

कुछ घंटे पहले

श्रद्धांजलि

शहीद-ए-आज़म भगतसिंह: क्रांति, विचार और 'इंकलाब ज़िंदाबाद' के अमर नायक

28 सितंबर 2026 - शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 119वीं जयंती है। उनका प्रसिद्ध नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध आदमी होने की असली तमीज़ और चेतना का महाकाव्य है। यह वर्ष 'नौजवान भारत सभा' का शताब्दी वर्ष और 'शहीद यादगार समिति' का रजत जयंती वर्ष भी है। भगत सिंह की क्रांतिकारी आवाज़ केवल शोर नहीं थी, बल्कि उसके पीछे गहरा अध्ययन, सामाजिक न्याय और विश्व के महान विचारकों का वैचारिक आधार था। साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत ने डरकर 23 मार्च 1931 को उन्हें फाँसी दे दी, लेकिन उनके विचार आज भी अमर हैं। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ बाज़ारवाद, शोषण और अन्याय के खिलाफ आम आदमी की चेतना और बदलाव के लिए संघर्ष का प्रतीक है। आज के अवसरवादी राजनीतिक दौर में भगत सिंह के विचार एक न्यायपूर्ण भविष्य गढ़ने की प्रेरणा देते हैं और मशाल बनकर राह दिखाते हैं।

27 सितंबर 2026

राष्ट्रीय

चुनावी लोकतंत्र में धांधली का पर्दाफ़ाश ~ नीलोत्पल बसु

वोटर लिस्ट में शुद्धि के नाम पर करोड़ों नागरिकों के मताधिकार पर डाका- यह लोकतंत्र का सुधार नहीं, उसका संहार है! विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में अन्य आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के एकतरफा फैसलों ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी सॉफ्टवेयर, आईटी विभाग के केंद्रीकरण और 'फॉर्म 7' के थोक दुरुपयोग के जरिए करोड़ों पात्र व अल्पसंख्यकों के नाम मतदाता सूची से बाहर करने की साजिश का पर्दाफाश हुआ है। अपीलों की जांच में 91% मामलों में नाम बहाल होना आयोग की मनमानी और न्यायिक ट्रिब्यूनल व सुप्रीम कोर्ट की नाकामी को उजागर करता है। यदि निष्पक्षता और जिम्मेदार अधिकारियों की बर्खास्तगी की मांग नहीं उठाई गई, तो देश के चुनावी लोकतंत्र का भविष्य बेहद अंधकारमय है।

27 सितंबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
राष्ट्रीय

प्रश्नपत्र लीक:'नीट' रद्द । जिम्मेदार कौन ?

पेपर माफिया बेलगाम। जिम्मेदार कौन ?
नीट प्रश्नपत्र लीक के पीछे एक अत्यंत संगठित गिरोह होने की बात जांचकर्ता मान रहे है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्रश्नपत्र राजस्थान, हरियाणा, केरल, जम्मू- काश्मीर, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में फैल गया था पूरा काम अत्यंत संगठित तरीके से होता है । प्रश्नपत्र विभिन्न चरणों में अलग-अलग स्तरों पर बेचे जाते हैं ये सीधे छात्रों को नहीं बेचे जाते। प्रश्नपत्र बेचने के लिए अलग 'थोक' और 'खुदरा' बाजार होते हैं। किसी भी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक गिरोह में 100 करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन की संभावना है।

केशव कुमार भट्टड़ • 12 मई 2026

राष्ट्रीय

नीट पेपर लीक का 'मास्टरमाइंड' निकला NTA का अधिकारी

सीबीआई ने आरोपी की पहचान पीवी कुलकर्णी के रूप में की है। जांच में सामने आया है कि कुलकर्णी न केवल रसायन शास्त्र (Chemistry) के प्रोफेसर थे, बल्कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था 'एनटीए' के एक प्रभावशाली अधिकारी भी थे। इसी पद पर रहने के कारण प्रश्नपत्रों तक उनकी आसान पहुंच थी।

केशव कुमार भट्टड़ • 15 मई 2026

राष्ट्रीय

'पहाड़' पर 'दिल्ली' का ताला: स्वायत्तता छीनने पर गरजे मोहम्मद सलीम!

'पहाड़' की ताकत 'पहाड़' के हाथों में क्यों नहीं?! अफसरों के दम पर स्वायत्तता का नाटक बंद करो!" स्वायत्तता छीने जाने पर गरजे मोहम्मद सलीम!" - दार्जिलिंग के कलामंदिर हॉल में आयोजित कार्यकर्ताओं की सभा में सीपीआई(एम) पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने भाजपा और आरएसएस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार स्वायत्त निकाय जीटीए (GTA) में प्रतिनिधियों के चुनाव कराने के बजाय प्रशासक बिठाकर लोकतंत्र और पहाड़ के अधिकारों का हनन कर रही है। कश्मीर से लद्दाख और दार्जिलिंग तक क्षेत्रीय स्वायत्तता को खत्म करने की साजिश का दावा करते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि भाजपा न तो बहुलतावाद को मानती है और न ही विविधता का सम्मान करती है। पार्टी ने घोषणा की कि वे संविधान की छठी अनुसूची, भूमि अधिकार, चाय बागान श्रमिकों की बदहाली, पर्यावरण विनाश और नागरिकता के नाम पर हो रहे भेदभाव के मुद्दों को लेकर अक्टूबर-नवंबर में पहाड़ की जनता के बीच एक व्यापक जन-अभियान चलाएंगे।

केशव कुमार भट्टड़ • 14 सितंबर 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement