क्या चुनाव आयोग को अदृश्य शक्तिशाली हाथ नियंत्रित कर रहे हैं ? नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल और भीतर से उठता असंतोष - केन्द्रीय चुनाव आयोग पर यह दोहरा खुलासा - साबित करता है कि देश की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्था अब संविधान, नैतिकता और परंपरा की कसौटी पर पूरी तरह संदिग्ध बन चुकी है। 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने विभाजित फैसला सुनाया है, जिसके बाद मामला प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को भेज दिया गया है। पीठ के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश को हटाकर केंद्रीय मंत्री को शामिल करने पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होती है। अंतिम निर्णय के लिए सुप्रीम कोर्ट में जारी देरी को जजों ने खुद "संस्थागत शर्मिंदगी" करार दिया है। दूसरी ओर, 'द इंडियन एक्सप्रेस' के खुलासे के अनुसार, आयोग के दो चुनाव आयुक्तों - सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी - ने पिछले 10 महीनों में 14 बार प्रक्रियागत उल्लंघनों, अवैध फॉर्म बदलावों और आईटी शक्तियों के केंद्रीयकरण पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन आपत्तियों पर आयोग ने ठोस जवाब देने के बजाय इन्हें केवल 'आंतरिक सुझाव' बताकर 'टालने' की कोशिश की है।
संविधान, नैतिकता और परंपरा की कसौटी पर केन्द्रीय चुनाव आयोग
क्या भारत केवल एक 'पाखंडी लोकतंत्र' बनकर रह गया है?
एक ओर जहाँ 2023 के विवादास्पद नियुक्ति कानून के ज़रिए चुनाव आयोग के चयन से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर कार्यपालिका के वर्चस्व पर सुप्रीम कोर्ट में विभाजन गहरा गया है, वहीं दूसरी ओर आयोग के अपने प्रेस नोट ने दो आयुक्तों द्वारा उठाई गई 14 ऑन-रिकॉर्ड आपत्तियों का कोई सीधा जवाब न देकर संस्थागत पतन पर मुहर लगा दी है।
नई दिल्ली। कोलकाता ।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी वास्तविक लोकतंत्र की आत्मा होते हैं। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को एक ऐसी निष्पक्ष, स्वायत्त और पारदर्शी संस्था के रूप में गढ़ा था, जो सत्ताधारी दल के दबाव से मुक्त होकर जनमत की पवित्रता की रक्षा कर सके। लेकिन हालिया घटनाक्रमों - नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में उलझे संवैधानिक सवालों से लेकर चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्तों की अनदेखी और उस पर आयोग की गोलमोल सफाई - ने यह साबित कर दिया है कि संविधान, नैतिकता और स्थापित परंपराओं की कसौटी पर चुनाव आयोग एक अत्यंत संदिग्ध और क्षरित संस्थान बन चुका है।
जब देश की सबसे बड़ी चुनावी संस्था के भीतर पारदर्शिता समाप्त हो जाए और बाहर से उसकी स्वायत्तता का अपहरण कर लिया जाए, तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा केवल एक 'पाखंडी लोकतंत्र का आवरण' मात्र बनकर रह जाता है। जागरूक पाठकों के लिए प्रस्तुत है दो स्वतंत्र पर अंतर्संबंधित घटनाक्रमों का विश्लेषण:
भाग 1: नियुक्ति कानून 2023 पर सुप्रीम कोर्ट में विभाजित फैसला - 'संस्थागत शर्मिंदगी' और कार्यपालिका का कब्जा
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से जुड़े वर्ष 2023 के अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने एक विभाजित फैसला सुनाया है। मामला अब भारत के प्रधान न्यायाधीश के पास भेज दिया गया है ताकि वे इस पर विचार कर सकें कि क्या इसके लिए कम से कम 5 जजों की संविधान पीठ का गठन किया जाना चाहिए।
2023 का कानून और संवैधानिक विवाद की जड़
2023 के इस नए कानून के तहत चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए बनी तीन सदस्यीय समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। इसकी पृष्ठभूमि ऐतिहासिक मामले 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' (मार्च 2023) से जुड़ी है। उस समय सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था कि जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक समिति करेगी। कोर्ट का स्पष्ट उद्देश्य चुनाव आयोग को कार्यपालिका (सरकार) के सीधे नियंत्रण और प्रभाव से मुक्त रखना था। इसके विपरीत , संसद द्वारा पारित 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023' में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया। इसके चलते चयन समिति में सरकार का स्पष्ट बहुमत - 2 बनाम 1- हो गया। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि जब सरकार खुद अपनी पसंद के आयुक्त चुनेगी, तो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
दो जजों की पीठ में तीखा मतभेद
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजने पर तो सहमति जताई, लेकिन इसके वैधानिक तर्कों पर दोनों के बीच गहरा मतभेद सामने आया:
जस्टिस दीपांकर दत्ता का रुख: उनका मानना था कि इस याचिका पर यह पीठ खुद फैसला कर सकती है और संविधान पीठ की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि 'अनूप बरनवाल' फैसले में सिद्धांत पहले ही तय हो चुका है कि नियुक्ति प्रक्रिया "विशेष कार्यपालक नियंत्रण" में नहीं रह सकती। उन्होंने चयन समिति की संरचना पर अत्यंत तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित मंत्री मौजूद हों (जो सामूहिक जिम्मेदारी से बंधे हैं), तो विपक्ष के नेता की भूमिका महज 'औपचारिक' (सजावट का गहना) बनकर रह जाती है। उन्होंने जोर देकर कहा, "चुनाव आयोग को न केवल स्वतंत्र होना चाहिए, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।" उन्होंने सरकार द्वारा कॉलेजियम व्यवस्था से इसकी तुलना को भी खारिज कर दिया।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का रुख: वे जस्टिस दत्ता से असहमत थे। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट पहली बार 2023 के इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता की जांच कर रहा है और चूंकि इस पर कोई पूर्व निर्णय नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 145(3) के तहत इसे पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा ही सुना जाना चाहिए।
फैसले में देरी पर चिंता: 'संस्थागत शर्मिंदगी'
दोनों जजों ने इस बात पर चिंता जताई कि ऐसे महत्वपूर्ण मामलों को पहले तीन जजों की पीठ में भेजना और फिर संविधान पीठ तक पहुंचाना केवल समय की बर्बादी है। उन्होंने रेखांकित किया कि 'अनूप बरनवाल' मामले का फैसला आने में आठ साल लग गए थे। इस तरह के लंबे विलंब को जजों ने "संस्थागत शर्मिंदगी" करार दिया और भारत के मुख्य न्यायाधीश से संवैधानिक मामलों के त्वरित निपटारे के लिए एक स्थायी पांच-न्यायाधीशों की पीठ गठित करने का आग्रह किया।

'मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अवैध तरीके से काम कर रहे हैं। चुनाव आयोग में तीन सदस्य होते हैं। हर फैसला सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिया जाना चाहिए। वह दो सदस्यों के बहुमत की राय को नजरअंदाज कर रहे हैं और अपनी राय थोप रहे हैं। इसलिए, उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। उन्हें इस्तीफा देना चाहिए। अगर वे इस्तीफा नहीं देते हैं, तो सरकार को उन्हें हटा देना चाहिए।
-सीपीआई (एम) महासचिव एमए बेबी
भाग 2: 'द इंडियन एक्सप्रेस' के खुलासे पर चुनाव आयोग की सफाई - मुख्य सवालों से भागता चुनाव आयोग
एक तरफ जहाँ अदालत में आयोग की निष्पक्षता पर सुनवाई चल रही थी, वहीं दूसरी तरफ 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक खोजी रिपोर्ट ने उजागर किया कि तीन सदस्यीय आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी - ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार प्रक्रियागत उल्लंघनों और अपनी जानकारी के बिना लिए गए फैसलों पर ऑन-रिकॉर्ड आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
खोजी रिपोर्ट के बाद चौतरफा घिरे चुनाव आयोग ने बुधवार को एक प्रेस नोट जारी कर अपनी सफाई पेश की। हालाँकि, आयोग का यह जवाब उसके प्रशासनिक पतन और मुख्य चिंताओं पर पर्दा डालने का एक असफल प्रयास मात्र साबित हुआ।
आयोग की लीपापोती और 'सर्वसम्मति' का दावा
चुनाव आयोग ने 14 नोटों के अस्तित्व, उनकी तारीखों या सामग्री पर कोई इनकार नहीं किया। इसके बजाय, आयोग ने इन्हें आंतरिक असहमतियों के बजाय केवल "निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा" और "सुझाव" करार दिया।

पढ़ें मूल खबर: 'तीन में से दो' आयुक्तों की अभूतपूर्व बगावत: 10 महीनों में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के कदमों पर 'ऑन-रिकॉर्ड' दर्ज कराई आपत्ति
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आयोग ने दावा किया:
किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग विचार और टिप्पणियां आना एक सामान्य प्रक्रिया है। (2) सदस्यों द्वारा लिखे गए 'लिखित नोट' और 'चेक्स एंड बैलेंसेस' चुनावी प्रक्रिया को 'बेहतर बनाने के मानक अभ्यास' हैं। (3) पिछले एक साल में आयोग द्वारा शुरू की गई 40 नई पहलों, निर्देशों और SIR सहित मतदाता सूची पुनरीक्षण के सभी फैसले पूरे आयोग की "सर्वसम्मत सहमति" से लिए गए हैं। (4) 10 महीनों में फैले कुछ आंतरिक नोटों को हाइलाइट करना केवल एकतरफा तस्वीर पेश करता है।
मूल सवालों पर चुनाव आयोग की रहस्यमयी चुप्पी
आयोग की यह सफाई इस बात का कोई जवाब नहीं दे पाई कि अगर सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए थे, तो दोनों आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई 'लिखित आपत्तियों को नजरअंदाज' कैसे किया गया ? -
फॉर्म-6 में अवैध बदलाव: 16 मई को विवेक जोशी और 19 मई को संधु ने फाइल पर लिखा था कि 'निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960' में संशोधन किए बिना फॉर्म-6 (नए वोटर फॉर्म) में बदलाव नहीं हो सकता। इसके बावजूद जुलाई में बदलाव लागू कर दिया गया, जिसे संधु ने 13 अगस्त को "अनधिकृत और गैर-कानूनी" बताते हुए तुरंत हटाने को कहा। आयोग यह बताने में विफल रहा कि दो आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद यह अवैध बदलाव किसने मंजूर किया ?
पश्चिम बंगाल की अपीलें: सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित ट्रिब्यूनल के समक्ष पश्चिम बंगाल में बहाल मतदाताओं के खिलाफ ECI की ओर से दायर 16.30 लाख अपीलों को किसने अधिकृत किया ? आयुक्तों को इसकी जानकारी तक नहीं थी।
सॉफ्टवेयर का केंद्रीयकरण: चुनाव आयुक्त संधु ने 14 अगस्त के नोट में दर्ज किया था कि मैदानी अधिकारियों (EROs) की ERONet तक पहुंच रोकी जा रही है और IT महानिदेशक के पास ऐसा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। आयोग इस बात का जवाब नहीं दे पाया कि ECINet के स्वतंत्र ऑडिट के प्रस्ताव को दबा क्यों दिया गया ?
कैबिनेट सचिव को पत्र: 28 जुलाई को आयोग की सलाह के बिना जारी किए गए कार्य-बंटवारे के आदेश के खिलाफ दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर 2023 अधिनियम के उल्लंघन का आरोप लगाया था और बाद में 30 जुलाई को उस आदेश को खुद रद्द किया था। आयोग ने अपने प्रेस नोट में इस अभूतपूर्व घटना का कोई जिक्र तक नहीं किया।
महीनों तक बैठक न होना: मई से अगस्त के बीच चार महीनों तक पूर्ण आयोग की एक भी बैठक क्यों नहीं बुलाई गई?
पाखंड का आवरण और लोकतंत्र में संस्थागत शून्यता का दौर
जब इन दोनों खबरों के सूत्रों को जोड़ते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र का एक डरावना चेहरा सामने आता है:
संवैधानिक स्तर पर: केन्द्रीय सरकार एक ऐसा कानून बनाती है जो चुनाव आयोग के चयन में विरोधी आवाजों और स्वतंत्र न्यायपालिका - भारत के मुख्य न्यायाधीश - को बेदखल कर अपना एकाधिकार (मोनोपॉली) स्थापित करती है।
प्रशासनिक व नैतिक स्तर पर: उस कानून से बनी व्यवस्था के तहत काम कर रहे आयोग में जब दो सदस्य नियमों के उल्लंघन, अवैध फॉर्म बदलावों और आईटी केंद्रीयकरण पर सवाल उठाते हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त और शीर्ष नौकरशाही उन आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा और मनमाने फैसले लागू करती है। और जब भांडा फूटता है, तो इसे केवल "सुझाव" बताकर खारिज कर दिया जाता है।
यदि देश की सबसे बड़ी अदालत 'नियुक्ति कानून की वैधता तय करने में वर्षों का समय लगाती है' और 'आयोग खुद अपनी आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता को ढोंग बना देता है' - तो यह केवल संस्थागत पतन नहीं है। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि भारत में चुनावी प्रक्रिया की स्वायत्तता खत्म हो चुकी है और लोकतंत्र अब केवल एक दिखावा यानी महज पाखंड का आवरण बनकर रह गया है। अगर संवैधानिक संस्थाओं की इस दुर्दशा पर जनता और प्रबुद्ध समाज ने अब भी आवाज नहीं उठाई, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ निष्पक्ष चुनावों का इतिहास ही पढ़ पाएंगी, उन्हें जीने का हक खो चुकी होंगी।

पढ़ें मूल खबर: 'तीन में से दो' आयुक्तों की अभूतपूर्व बगावत: 10 महीनों में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के कदमों पर 'ऑन-रिकॉर्ड' दर्ज कराई आपत्ति

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स्रोत साभार : बांग्ला दैनिक गणशक्ति 24.09.2026, अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्स्प्रेस 24.09.2026 एवं अन्य
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