सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी , भाकपा के महासचिव डी. राजा और भाकपा-माले लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने आज संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। वामपंथी दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक सप्ताह भर के देशव्यापी विरोध का ऐलान किया है। इसमें 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया के नाम पर करोड़ों नागरिकों के मताधिकार छीनने का आरोप लगाया गया है। वाम दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे/महाभियोग और SIR प्रक्रिया पर तुरंत रोक की मांग की है। इस आंदोलन में शहीद भगत सिंह जयंती (28 सितंबर) और गांधी जयंती (2 अक्टूबर) के अवसर पर विशाल जन-विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। वामपंथी नेताओं ने सभी धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों, सिविल सोसाइटी और जन-बुद्धिजीवियों से इस अभियान में शामिल होने की अपील की है।
संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी , भाकपा के महासचिव डी. राजा और भाकपा-माले लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने संबोधित किया।
लोकतंत्र और मताधिकार की रक्षा में एक साथ आए वाम दल
26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक देशव्यापी विरोध अभियान का ऐलान
नई दिल्ली: नई दिल्ली। भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की साख, चुनावी मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी और मताधिकार के हनन के मुद्दों को लेकर वामपंथी दलों ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग के खिलाफ व्यापक मोर्चा खोल दिया है। तीन प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और भाकपा (माले) लिबरेशन - की उच्चस्तरीय बैठक में देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति और चुनावी प्रणाली पर गहरा संकट व्यक्त करते हुए 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक एक सप्ताह लंबे राष्ट्रव्यापी विरोध अभियान का आह्वान किया गया है।संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी , भाकपा के महासचिव डी. राजा और भाकपा-माले लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने संबोधित किया। इस अवसर पर कई अन्य शीर्ष वामपंथी नेता उपस्थित रहे।
'द इंडियन एक्सप्रेस' की हालिया खोजी रिपोर्ट का हवाला देते हुए वाम नेताओं ने कहा कि देश का मुख्य निर्वाचन आयोग अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। आयोग के भीतर ही दो अन्य चुनाव आयुक्तों द्वारा बार-बार उठाए गए सवालों और आपत्तिजनक प्रक्रियाओं ने यह साफ कर दिया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का संवैधानिक जनादेश खतरे में है।
माकपा (CPI-M) के महासचिव एम. ए. बेबी (M. A. Baby) ने इस संवाददाता सम्मेलन में शुरुआती अपनी बात रखी और फिर पूर्व-निर्धारित यात्रा (Travel Plans) के कारण बैठक से अनुमति ली। उन्होंने कहा कि 'इंडियन एक्सप्रेस' में छपी खोजी रिपोर्ट के बाद देश में चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया को लेकर बेहद असाधारण और गंभीर परिस्थिति पैदा हो गई है। उन्होंने घोषणा की कि तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने मिलकर निर्णय लिया है कि 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक एक सप्ताह लंबा राष्ट्रव्यापी विरोध अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस विरोध सप्ताह के दौरान 28 सितंबर को शहीद भगत सिंह की जयंती और 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती आती है। ये दोनों महान विभूतियां देश में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ने वाली शक्तियां थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस अभियान में रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) और फॉरवर्ड ब्लॉक (Forward Bloc) को भी जोड़ा जा रहा है। साथ ही, भाजपा और उसके एनडीए (NDA) सहयोगियों को छोड़कर देश की सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों को एक साथ लाने के लिए उनसे विचार-विमर्श किया जाएगा। एम. ए. बेबी ने कहा कि केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन, सिविल सोसाइटी मूवमेंट, कलाकार, लेखक, विद्वान और प्रसिद्ध प्रबुद्ध जन (जैसे टी.एम. कृष्णा) भी इस आंदोलन का हिस्सा बनेंगे।
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वाम दलों की मुख्य माँगें
भाकपा (CPI) के महासचिव डी. राजा ने इस संवाददाता सम्मेलन में चुनाव आयोग (ECI) की साख, लोकतांत्रिक व्यवस्था और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर चुनाव आयोग के कामकाज पर तीखे सवाल उठाए। डी राजा ने कहा कि वर्तमान चुनाव आयुक्तों ने ही नहीं, बल्कि पूर्व चुनाव आयुक्तों ने भी आयोग की गिरती साख और कार्यप्रणाली पर चिंता जताई है। डी. राजा ने कहा कि भारतीय चुनाव आयोग एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है, जिसका काम निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराना तथा सभी पात्र नागरिकों के मताधिकार की रक्षा करना है। डी. राजा ने मांग की कि CEC को तुरंत अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए, और यदि वे इस्तीफा नहीं देते हैं तो उन्हें पद से हटाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक संवैधानिक संस्था होने के नाते चुनाव आयोग को पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ होना चाहिए। इसे सत्ता में बैठे लोगों या सरकार के किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकना चाहिए। पिछले कुछ समय से आयोग का जो रुख रहा है, वह बेहद चिंताजनक है।
प्रमुख मांगें:
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का इस्तीफा / महाभियोग: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (Ganesh Kumar) अपने संवैधानिक दायित्वों में पूरी तरह विफल रहे हैं। वे या तो तुरंत अपने पद से इस्तीफा दें, अन्यथा उन पर लंबित महाभियोग (Impeachment) चलाकर उन्हें बर्खास्त किया जाए।
SIR प्रक्रिया पर तुरंत रोक: विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) के नाम पर देश भर में गरीब और आम नागरिकों के नाम मतदाता सूची से अवैध रूप से हटाए गए हैं। इस प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से स्थगित किया जाए।
मताधिकार की बहाली: जिन भी वैध मतदाताओं के नाम अनुचित तरीके से हटाए गए हैं, उनके नाम तुरंत मतदाता सूची में वापस जोड़े जाएं।
सप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप नया कानून: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को दरकिनार कर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए कानून को रद्द किया जाए और आयोग की स्वतंत्रता, तटस्थता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक गारंटी दी जाए।
चुनावों की वैधता पर सवाल: जिन राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि) में मतदाता सूचियों में धांधली और सॉफ्टवेयर के केंद्रीकृत हेरफेर के आधार पर चुनाव कराए गए हैं, वहां चुनाव की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं और नए सिरे से निष्पक्ष चुनाव कराने की मांग उठ रही है।
भगत सिंह की जयंती से गांधी जयंती तक जनांदोलन
वाम नेताओं ने स्पष्ट किया कि 26 सितंबर से शुरू हो रहा यह एक सप्ताह का कार्यक्रम केवल वामपंथी पार्टियों तक सीमित नहीं रहेगा।
28 सितंबर (शहीद भगत सिंह जयंती): इस ऐतिहासिक अवसर पर राजधानी दिल्ली में एक बड़ा संयुक्त विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा।
2 अक्टूबर (महात्मा गांधी जयंती): लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के स्तंभों को याद करते हुए इस अभियान का समापन एक बड़े जनांदोलन के रूप में किया जाएगा।
इसके साथ ही, वाम दल इस मुद्दे पर रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (AIFB) से लगातार संपर्क में हैं, ताकि पांचों वामपंथी दल एक साथ इस अभियान की अगुवाई कर सकें।
गैर-भाजपा दलों, नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों से व्यापक गोलबंदी की अपील
वामपंथी नेताओं ने रेखांकित किया कि यह मुद्दा केवल वाम दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को बचाने का सवाल है।
राजनीतिक एकता: भाजपा और उसके एनडीए (NDA) सहयोगियों को छोड़कर देश की सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टियों को एक मंच पर लाने के लिए बातचीत की जा रही है। नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग किसी सत्ताधारी दल के दबाव में काम करने वाली एजेंसी नहीं बन सकता। यह बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है
नागरिक समाज और प्रबुद्ध वर्ग: इस संघर्ष को एक व्यापक जनांदोलन का रूप देने के लिए सामाजिक संगठनों, नागरिक समाज आंदोलनों, सार्वजनिक बुद्धिजीवियों (जैसे टी.एम. कृष्णा), सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, कलाकारों, लेखकों, शोधकर्ताओं, छात्रों और आम नागरिकों को एकजुट होने का आह्वान किया गया है कि वे लोकतंत्र, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और संविधान को बचाने के लिए इस जन-संघर्ष के साझा मंच से जुड़ें।
वाम नेताओं के अनुसार, "चुनाव आयोग की निष्पक्षता हमारे देश में लोकतंत्र का लाइव वायर है। यदि चुनाव प्रक्रिया को ही ध्वस्त कर दिया जाएगा, तो लोकतंत्र का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इसलिए इस बड़े मुद्दे पर एक व्यापक जन-अभियान चलाया जा रहा है।"
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इंडियन एक्सप्रेस' के खुलासे पर चुनाव आयोग के रुख की आलोचना
वाम नेताओं ने 'इंडियन एक्सप्रेस' की खोजी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने रिपोर्ट के तथ्यों का खंडन नहीं किया है, जिससे यह साबित होता है कि रिपोर्ट पूरी तरह सत्य है। आयोग का यह तर्क कि उसने कई राज्यों में सफलतापूर्वक चुनाव कराए हैं, पूरी तरह हास्यास्पद और शर्मनाक है। जब पूरी मतदाता सूची ही गलत (compromised) हो और सॉफ्टवेयर हेरफेर के जरिए मतों का अधिकार छीना गया हो, तो ऐसे चुनावों को 'सफल' नहीं कहा जा सकता।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मताधिकार पर सबसे बड़ा हमला
भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने डेटा और ऑडिट सर्वेक्षणों का जिक्र करते हुए कहा कि दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चल रहे सर्वे से सामने आया है कि पिछले एक साल में करीब 13 करोड़ लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया है। विश्व के किसी भी लोकतंत्र में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के वोट का अधिकार छीनने का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा चुनावी अपराध और भ्रष्टाचार है। आयोग इस अक्षम्य अपराध का बचाव नहीं कर सकता।
वाम दलों ने स्पष्ट किया है कि जब तक देश के नागरिकों को चुनावी न्याय नहीं मिल जाता और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता बहाल नहीं हो जाती, तब तक यह जनांदोलन सड़क से लेकर संसद तक जारी रहेगा।

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