चुनाव आयोग के भीतर अभूतपूर्व बगावत:
10 महीनों में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के कदमों पर 'ऑन-रिकॉर्ड' दर्ज कराई आपत्ति
मुख्य चुनाव आयुक्त के 'एकतरफा' फैसलों के खिलाफ दो चुनाव आयुक्तों का मोर्चा; नए वोटर जोड़ने से लेकर नाम हटाने और अफसरों को अंधेरे में रखने पर सवाल
नई दिल्ली : जून 2025 में बिहार से शुरू हुआ भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) - जो आमतौर पर मतदाता सूची की नियमित सफाई की प्रक्रिया होती है - 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटा चुका है। इसने आयोग को इस बात की तीखी सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है कि किसे वोट देने का अधिकार मिले और किसे नहीं। इसी अवधि के दौरान खुद तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग के भीतर इन्हीं मुद्दों पर बार-बार सवाल उठाए गए। ये सवाल किसी और ने नहीं, बल्कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों - सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी - ने उठाए।
SIR के राष्ट्रीय क्रियान्वयन की निगरानी तीनों आयुक्तों की देखरेख में होती रही है। लेकिन संधु और जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार - एक ही दिन में चार बार - उन फैसलों और जारी किए गए आदेशों पर आधिकारिक रिकॉर्ड पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं, जो उनके अनुसार उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे।
दांव इससे ऊंचे नहीं हो सकते।
ऐसा इसलिए क्योंकि ये आपत्तियां चुनाव आयोग के मूल जनादेश के केंद्र से जुड़ी हैं: नए मतदाताओं का पंजीकरण; मतदाता सूची से नाम हटाना और उन्हें बहाल करना; SIR प्रक्रिया में मतदाताओं को बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील दाखिल करना; और पूरी मतदाता सूची का स्वामित्व तथा उसकी सुरक्षा। इन सभी से जुड़ी आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गईं। कुछ आपत्तियां उनकी देखरेख वाले उप चुनाव आयुक्तों को भेजी गईं।
ऐसी ही एक लिखित आपत्ति में संधु शिकायत करते हैं कि चुनाव आयोग ने दो आयुक्तों की लिखित सलाह के विपरीत काम किया और उनका दावा है कि आयोग की यह कार्रवाई "अनधिकृत और गैर-कानूनी (unauthorised and illegal)" थी। हाल ही में, सामान्य परिपाटी से पूरी तरह हटकर, जोशी और संधु ने कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर कार्य आवंटन में किए गए उन बदलावों की शिकायत की, जिन्होंने वास्तव में मतदाता सूची के लिए आईटी रीढ़ की देखरेख की एक परत को खत्म कर दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए थे और उन्होंने उन्हें रद्द कर दिया।
इसके बाद, 9 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई, जो चार महीनों में उनकी पहली पूर्ण बैठक थी।
'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार पत्रकारों ने इन सभी पत्रों/आदान-प्रदानों को देखा है और नई दिल्ली, कोलकाता, गोवा तथा मुंबई में विभिन्न अधिकारियों का साक्षात्कार लेकर आयोग के भीतर की उस खींचतान को रेखांकित किया है, जो देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी वाले इस निकाय के भीतर पैमाने और महत्व के मामले में अभूतपूर्व है।
यह इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि तीनों की नियुक्ति एनडीए सरकार द्वारा 2023 के अधिनियम के तहत प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और विपक्ष के नेता की एक चयन समिति द्वारा की गई थी। मार्च 2024 में जब संधु और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था, तब विपक्ष के सदस्य, कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया पर असहमति दर्ज कराई थी। फरवरी 2025 में जब कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया और जोशी को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया, तब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी अपनी असहमति दर्ज कराई थी।
21 सितंबर को 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर आयोग को एक प्रश्नावली भेजी और पूछा कि उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए क्या किया गया। कोई जवाब नहीं मिला। दोनों चुनाव आयुक्तों को भी 21 सितंबर को ईमेल भेजकर पूछा गया कि क्या उनकी चिंताओं का समाधान किया गया और क्या 9 सितंबर की बैठक के दौरान ये मुद्दे उठाए गए थे। सोमवार और मंगलवार को फोन कॉल के जरिए भी संपर्क साधा गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
कुल मिलाकर, ये आपत्तियां किसी संवैधानिक प्राधिकरण के भीतर दर्ज की गई सबसे तीखी और लगातार आंतरिक दरार को दर्शाती हैं और चार प्रमुख बिंदुओं को छूती हैं:
1. "नया मतदाता" कौन है, फॉर्म-6 क्यों बदला गया?
इस साल जुलाई में, जैसा कि 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने सबसे पहले रिपोर्ट किया था, उस फॉर्म में एक नया सवाल पूछा जाने लगा जिसे हर वयस्क नागरिक को मतदाता बनने के लिए भरना होता है। आवेदन को SIR से जोड़ते हुए, इसमें पूछा गया कि क्या नया मतदाता या उनके माता-पिता/दादा-दादी "पिछली SIR की मतदाता सूची में मौजूद हैं"। आवेदक इसका उत्तर दिए बिना आगे नहीं बढ़ सकते थे।
यह तब हुआ जब मई में जोशी ने फाइल पर चेतावनी दी थी कि सरकार द्वारा 'निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960' में संशोधन किए बिना फॉर्म-6 में इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद यह बदलाव कर दिया गया। जुलाई में इस बदलाव की रिपोर्ट के बाद, संधु ने 13 अगस्त को रिकॉर्ड पर रखा कि यह "अनधिकृत और गैर-कानूनी" था और इसे "तुरंत हटाया जाना चाहिए"। सोमवार सुबह तक वह सवाल पोर्टल पर बना हुआ था।
2. मतदाता सूची तक किसकी पहुंच होनी चाहिए?
मतदाता सूची में हेरफेर के हर राजनीतिक आरोप के खिलाफ आयोग का सबसे मजबूत बचाव यह रहा है कि मतदाता सूची की तैयारी विकेंद्रीकृत (decentralised) है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की वोटर लिस्ट वहां के निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) द्वारा तैयार और नियंत्रित की जाती है, जो जमीन पर एक वैधानिक प्राधिकारी होता है। आमतौर पर ERO उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) होता है। यह सूची ERONet और उसके नए संस्करण ECINet सॉफ्टवेयर पर रहती है।
पिछले एक साल में, दोनों आयुक्तों ने बार-बार सवाल उठाया है कि क्या इस सूची तक EROs की पहुंच को अब सीमित किया जा रहा है। मई में जोशी ने इस बात को फ्लैग किया था—जब राज्यों में SIR गति पकड़ रहा था—कि मतदाता सूची डेटाबेस का धीरे-धीरे केंद्रीयकरण हो रहा है। उन्होंने यह प्रमाणित करने के लिए एक ऑडिट का प्रस्ताव रखा कि "संबंधित वैधानिक प्राधिकारियों के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति के पास (वोटर) डेटाबेस में कोई बदलाव करने का क्रेडेंशियल नहीं है"। अगस्त में संधु ने इसे दोहराया। उन्होंने दर्ज किया कि राज्य स्तर के चुनाव अधिकारी रिपोर्ट कर रहे हैं कि उनके पास ERONet पोर्टल तक उचित और पूरी पहुंच नहीं है। उन्होंने फ्लैग किया कि आयोग की आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना के पास कानून द्वारा वैधानिक प्राधिकारियों को दी गई उचित और पूरी पहुंच तथा काम करने की स्वतंत्रता को सीमित करने का "कोई कानूनी अधिकार नहीं है"। दशकों से आयोग जिस बचाव पर निर्भर रहा है, दोनों चुनाव आयुक्तों के अनुसार, उसे उसके अपने आईटी विभाग द्वारा भीतर से ही खत्म किया जा रहा था।
3. पश्चिम बंगाल: EC की ओर से अपीलों को किसने अधिकृत किया?
पश्चिम बंगाल में SIR सबसे अधिक विवादित रहा। 294 सीटों पर चुनाव हुए, जिनमें से 49 सीटों पर SIR के तहत हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी। लेकिन जिस तरह से नाम हटाए गए, उसने फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट को SIR के अंतिम चरण को आयोग के हाथों से लेकर न्यायिक अधिकारियों से "तार्किक विसंगतियों" के लिए चिह्नित 60 लाख मतदाताओं की स्थिति पर निर्णय कराने के लिए मजबूर किया। इनमें से 27 लाख मतदाताओं को बाद में आयोग द्वारा हटा दिया गया। इसके बाद अदालत ने उन फैसलों के खिलाफ अपीलों की सुनवाई के लिए सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के ट्रिब्यूनल का गठन करने का आदेश दिया। पिछले हफ्ते आयोग ने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल के समक्ष 38 लाख अपीलें लंबित थीं: 22.21 लाख अपीलें हटाए गए मतदाताओं द्वारा बहाल होने के लिए दायर की गई थीं, जबकि अन्य 16.30 लाख अपीलें उन मतदाताओं के खिलाफ दायर की गई थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किया था, और उन्हें हटाने की मांग की गई थी। आयोग ने यह नहीं बताया कि ये अपीलें किसने दायर कीं।
यही वह मुद्दा था जिसे संधु ने उन मतदाताओं के खिलाफ आयोग द्वारा अपील दायर करने के संबंध में उठाया था जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किया था। अगस्त में उन्होंने आयोग के अधिकारियों को लिखकर पूछा: "ECI की ओर से इन अपीलों को दायर करने के लिए कौन अधिकृत था, और किसके द्वारा?" तथा "ECI की ओर से वास्तव में ये अपीलें किसने दायर कीं?" उन्होंने दर्ज किया कि न तो उन्हें, न जोशी को और न ही पश्चिम बंगाल के वर्तमान मुख्य निर्वाचन अधिकारी को अपीलों को दायर करने के आधार या प्रक्रिया के बारे में सूचित किया गया था।
4. गोवा: सॉफ्टवेयर ने पात्र मतदाताओं को क्यों खारिज किया?
वही केंद्रीयकरण, जिसे जोशी और संधु ने बार-बार रेखांकित किया था, गोवा में संभावित मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का कारण बना। 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि SIR के दौरान "तार्किक विसंगतियों" के लिए चिह्नित मतदाताओं को अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले दस्तावेज जमा करने और सुनवाई का अवसर दिया जाए।
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने राज्य के प्रभारी वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश भारती को आठ बार लिखा (हर बार आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना को कॉपी करते हुए), रोलबैक विकल्प की मांग की जो EROs को पूर्व में हटाए गए नामों को उलटने की अनुमति दे, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशित किया था। अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की समय सीमा नजदीक आने के बावजूद इन अनुरोधों का कोई उत्तर नहीं मिला।
यह प्रावधान समय पर सक्षम नहीं किया गया। गोवा में 97 मतदाता अंतिम मतदाता सूची से बाहर छूट गए। 97 मतदाता भले ही एक छोटी संख्या लगे, लेकिन यह केवल 97 तक सीमित नहीं है—यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग का काम है कि हर वैध वोट गिना जाए।
मतदाता डेटाबेस की शुचिता: आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव का दरवाजा भी खटखटाया
वादा बहुत बड़ा था। 22 जनवरी को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने लगभग एक अरब मतदाताओं के लिए तकनीकी रीढ़ के रूप में 'ECINet' लॉन्च किया, जिससे उसके 40 से अधिक ऐप्स और पोर्टल एक ही छत के नीचे आ गए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा था कि इसे कानून के पूर्ण अनुपालन में बनाया गया है। आयोग की आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना ने कहा कि इससे "पारदर्शिता, विश्वसनीयता और जनता का विश्वास बढ़ेगा"। कुछ ही महीनों के भीतर, वही प्लेटफॉर्म जिसे मुख्य चुनाव आयुक्त और आईटी महानिदेशक ने कानूनी और भरोसेमंद बताया था, बिखरने लगा। नाम जोड़ने या हटाने और रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए कानून द्वारा निर्धारित राज्य के अधिकारी खुद को सिस्टम से बाहर पा रहे थे, दिल्ली में खन्ना की टीम द्वारा उनकी पहुंच को सीमित कर दिया गया था। यह स्वयं चुनावों की निष्पक्षता पर एक संभावित चोट थी। इसने दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी—को "मतदाता सूची डेटाबेस के धीरे-धीरे हो रहे केंद्रीयकरण" के बारे में लाल झंडा उठाने और चेतावनी देने के लिए प्रेरित किया कि ECINet जमीनी स्तर के अधिकारियों की शक्तियों को सीमित कर रहा है जो सूची तैयार करने और उसे अंतिम रूप देने के लिए जिम्मेदार थे।
तीन मौकों पर उन्होंने अपने नोट्स मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भेजे।
जब दिल्ली में आयोग के प्रशासन प्रभाग का प्रभार एक नए अधिकारी को सौंपा गया और उसने एक कार्य आवंटन आदेश जारी किया जिससे इन शक्तियों के और अधिक केंद्रीयकरण का खतरा पैदा हो गया, तो दोनों चुनाव आयुक्तों ने देश के शीर्ष नौकरशाह, कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखा। वास्तव में, दोनों चुनाव आयुक्त कानून के उल्लंघन की ओर इशारा कर रहे थे। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960 प्रत्येक विधानसभा सीट के लिए निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को मतदाता सूची की जिम्मेदारी सौंपते हैं। ERO आमतौर पर उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या जिला प्रशासन में समकक्ष रैंक का अधिकारी होता है। ERO वोटर लिस्ट तैयार करता है, दावों और आक्षेपों की सुनवाई करता है और तय करता है कि कौन से नाम रहेंगे और कौन से हटेंगे। यह जानबूझकर बनाई गई एक विकेंद्रीकृत व्यवस्था है। दशकों से ECI ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर के राजनीतिक आरोपों का जवाब देने के लिए इसी संरचना का सहारा लिया है। किसी एक व्यक्ति को मतदाता सूची को नियंत्रित करने की अनुमति नहीं है। कागजों पर, ERO अभी भी सूची के हर नाम पर फैसला करता है। लेकिन व्यावहारिक रूप से, कम से कम पिछले 10 महीनों से, राज्य दर राज्य इसका परीक्षण किया जा रहा है। कई ऐसे मामले हैं जहां ERO वह नहीं कर पाए जो सॉफ्टवेयर अनुमति देता है: नाम जोड़ना, हटाना, फैसला पलटना या अपील को प्रोसेस करना। सॉफ्टवेयर क्या अनुमति देता है, इसे दिल्ली में खन्ना का प्रभाग केंद्रीय रूप से नियंत्रित करता है।
नवंबर से अगस्त तक 10 महीनों के दौरान, दोनों आयुक्तों ने बार-बार और लिखित रूप से यह बात कही:
4 नवंबर 2025: चिंताएं ECINet से शुरू नहीं हुईं। इसकी पूर्ववर्ती प्रणाली ERONet, का उपयोग पहले से ही मतदाता सूची के प्रबंधन के लिए किया जा रहा था। संधु के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार ने खन्ना और वरिष्ठ अधिकारियों को लिखा कि "ERO, DEO और CEO के वैधानिक कार्यों का सख्ती से केवल उनके द्वारा निष्पादन किया जाना चाहिए" और "आईटी सिस्टम बिना किसी अपवाद के कानून के सख्त अनुपालन में होने चाहिए।"
2 जनवरी 2026: 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में SIR जारी रहने के साथ, आईटी प्रभाग ने EROs को नोटिस जारी करने और सुनवाई करने के लिए एक नए मॉड्यूल पर डाला। संजय कुमार ने खन्ना को पत्र लिखकर यह सुनिश्चित करने को कहा कि "आईटी प्रणाली इस तरह बनाई जाए कि ERO के किसी भी तरह से कार्य करने के विवेक को प्रतिबंधित न किया जाए।" बीस दिन बाद आयोग ने ECINet लॉन्च किया।
16 अप्रैल: संधु ने दर्ज किया कि आईटी विभाग ने उनकी जानकारी में लाए बिना या आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए बिना "पिछले कुछ महीनों में कई नए मॉड्यूल और पोर्टल विकसित किए हैं"। उन्होंने लिखा, "मुझे मीडिया से ही नए घटनाक्रमों के बारे में पता चला है।"
29 मई: जोशी ने CEC, संधु और संजय कुमार को "मतदाता सूची डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीयकरण" के बारे में लिखा और आईआईटी के किसी बाहरी विशेषज्ञ से ऑडिट का प्रस्ताव दिया ताकि यह प्रमाणित किया जा सके कि "संबंधित वैधानिक प्राधिकारियों के अलावा किसी के पास भी (वोटर) डेटाबेस में बदलाव करने का क्रेडेंशियल नहीं है।"
13 जुलाई: संधु ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए लिखा कि यह "प्रणाली में सुधार करेगा" और इसे आयोग के समक्ष रखा जाना चाहिए। एक महीने बाद, 14 अगस्त को संधु ने दर्ज किया: "इन दोनों चुनाव आयुक्तों के दो नोट्स पर क्या कार्रवाई की गई, यह अधोहस्ताक्षरी को ज्ञात नहीं है।"
28 जुलाई: आईटी प्रभाग के कामकाज को लेकर ECI के भीतर तनाव जुलाई के अंत में उस समय चरम पर पहुंच गया, जब आईटी प्रभाग पर निगरानी की एक स्थापित परत को हटा दिया गया। तब तक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय कुमार आईटी प्रभाग के काम की देखरेख और उसकी फाइलों को तीन सदस्यीय आयोग तक भेजने के लिए जिम्मेदार थे। 28 जुलाई को मनीष गर्ग (वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त) को प्रशासन का अतिरिक्त प्रभार दिया गया और कुछ ही घंटों में उन्होंने आयोग से परामर्श किए बिना संजय कुमार को आईटी महानिदेशक की देखरेख से हटा दिया।
29 जुलाई: एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर उपरोक्त आदेश की सूचना दी और इसे कानून का "स्पष्ट उल्लंघन" बताते हुए गर्ग के खिलाफ "समुचित कार्रवाई" की मांग की।
30 जुलाई: कैबिनेट सचिव को पत्र लिखने के एक दिन बाद संधु और जोशी ने संयुक्त रूप से गर्ग के आदेश को खारिज कर दिया।
14 अगस्त: इसके बाद संधु ने आईटी प्रणाली और मतदाता सूची के बारे में अपनी सबसे विस्तृत चिंता दर्ज की। उन्होंने लिखा कि CEOs, DEOs और EROs वैधानिक प्राधिकारी हैं, लेकिन कई लोगों ने उन्हें बताया कि उनके पास ERONet तक पूरी पहुंच नहीं है और उनकी शक्तियों को "DG(IT) के स्तर पर ERONet के केंद्रीय नियंत्रण द्वारा छोटा कर दिया गया है।" संधु ने पूर्ण पहुंच "तुरंत दिए जाने" का निर्देश दिया।
अवैध, अनधिकृत... यह युवाओं का उत्पीड़न है: फॉर्म-6 में बदलाव पर आयुक्तों की आपत्ति
यह बदलाव "गैर-कानूनी" और "अनधिकृत" है; इसे सरकार को भेजा जाना चाहिए; इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए ताकि नए, पहली बार बनने वाले मतदाताओं को प्रताड़ित न होना पड़े। दो चुनाव आयुक्तों की चेतावनी इससे अधिक स्पष्ट नहीं हो सकती थी—और फिर भी इसे नजरअंदाज कर दिया गया। यह बदलाव SIR से जुड़े प्रश्नों को फॉर्म-6 में ले आया—वह फॉर्म जिसे नए मतदाताओं को भरना होता है। इसमें आवेदकों को तीन बयानों में से एक चुनने को कहा गया: (1) क्या उनका नाम 2000 के दशक की शुरुआत में आयोजित अंतिम SIR के दौरान मतदाता सूची में दिखाई दिया था, (2) क्या उस सूची में माता-पिता या दादा-दादी का नाम दिखाई दिया था, या (3) क्या उनका या उनके माता-पिता का नाम उसमें नहीं था।
यह अनुभाग स्वयं अनिवार्य चिह्नित नहीं था, लेकिन आवेदक उत्तर दिए बिना फॉर्म जमा करने के लिए आगे नहीं बढ़ सकते थे। 'द इंडियन एक्सप्रेस' द्वारा जांचे गए आंतरिक रिकॉर्ड बताते हैं कि आयोग के तीन में से दो सदस्यों द्वारा मई में यह दर्ज किए जाने के बावजूद यह घोषणा जोड़ी गई कि चुनाव आयोग द्वारा केंद्र से परामर्श के बाद अधिसूचित 'निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960' में संशोधन किए बिना ऐसा नहीं किया जा सकता।
दो आयुक्त, एक चेतावनी
16 मई को SIR ढांचे के माध्यम से फॉर्म-6 को बदलने के प्रस्ताव का जवाब देते हुए चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। उन्होंने कहा कि SIR जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत आयोजित किया जा रहा था—वह प्रावधान जो आयोग को सूची के विशेष पुनरीक्षण का आदेश देने की अनुमति देता है—एक बार के उपाय और अपवाद के रूप में।
उन्होंने लिखा कि SIR के लिए निर्धारित फॉर्म उस अभ्यास के लिए विशिष्ट थे और गैर-सांविधिक थे। फॉर्म-6 और फॉर्म-8 (बदलाव और सुधार करने के लिए) कानून का हिस्सा हैं और "निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किए बिना उन्हें बदला नहीं जा सकता।" जोशी ने विशेष रूप से इस विचार को खारिज कर दिया कि SIR आदेश या गाइडलाइन का एक वाक्य कानून द्वारा तय किए गए फॉर्म को बदल सकता है।
उनका निष्कर्ष यह था कि "सबसे अच्छा और कानूनी रूप से टिकाऊ कदम यह होगा कि नियमों में बदलाव के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा जाए।" उन्होंने यह भी प्रस्ताव दिया कि फॉर्म-6 और फॉर्म-8 में बदलाव का एक मसौदा तुरंत आयोग के सामने रखा जाए। 19 मई को उनके सहयोगी सुखबीर सिंह संधु ने फाइल पर जोशी से सहमति व्यक्त की।
12 जुलाई को 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने सबसे पहले आयोग के ECINet पोर्टल पर फॉर्म-6 में नई घोषणा की रिपोर्ट दी। 13 अगस्त को द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए संधु ने आईटी प्रभारी उप चुनाव आयुक्त और महानिदेशक को लिखा (जिसमें CEC ज्ञानेश कुमार और जोशी को कॉपी किया गया था)।
संधु ने जोशी के 16 मई के नोट को याद किया, जिससे वह सहमत थे कि फॉर्म-6 नियमों में निहित एक वैधानिक फॉर्म था और सक्षम प्राधिकारी (अर्थात सरकार) से अनुमोदन के बिना इसे बदला नहीं जा सकता था।
संधु ने लिखा कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा व्यक्त किए गए इन स्पष्ट विचारों के बावजूद, पोर्टल पर फॉर्म-6 में "अनधिकृत/अवैध" बदलावों को नहीं हटाया गया था और मूल फॉर्म को बहाल नहीं किया गया था। उन्होंने लिखा कि इन बदलावों को "तुरंत हटाया जाना चाहिए ताकि युवा और संभावित पहली बार बनने वाले मतदाता, जो अन्यथा पात्र हैं, बिना किसी उत्पीड़न के कानून के अनुसार मतदाता के रूप में पंजीकरण करा सकें।"
इस जोड़ का क्या मतलब है?
वोट देने का अधिकार व्यक्ति का है—व्यक्ति उम्र, नागरिकता और निवास के आधार पर अर्हता प्राप्त करता है, न कि इस आधार पर कि उसके माता-पिता ने पिछले पुनरीक्षण में जगह बनाई थी या नहीं। और एक ऐसे SIR में जहां 13 करोड़ से अधिक लोगों के नाम पहले ही सूची से हटा दिए गए हैं, ऐसा सवाल डालने से उनके बच्चों पर भी साया मंडराता है। यह इसलिए भी महत्व रखता है क्योंकि फॉर्म-6 को बदलने का एक स्पष्ट रास्ता पहले से मौजूद है। 2021 में संसद ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में संशोधन कर आयोग को मतदाताओं से आधार नंबर एकत्र करने की अनुमति दी थी। फॉर्म-6 में वह बदलाव आयोग द्वारा खुद नहीं किया गया था: 17 जून 2022 को कानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने निर्वाचकों के पंजीकरण नियमों और फॉर्म-6 में तदनुरूपी बदलावों को अधिसूचित किया था। इसी कानूनी ढांचे के खिलाफ इस साल फॉर्म-6 में प्रस्तावित SIR-लिंक्ड बदलाव आयोग के सामने आया था।
यह दरार क्या उजागर करती है: आयोग के कामकाज पर मंडराते बादल
चुनाव आयोग के भीतर पहले भी असहमति (dissent) रही है, लेकिन इससे पहले कभी भी दो चुनाव आयुक्तों ने ऐसे रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज नहीं कीं जो स्वयं चुनावी प्रक्रिया के मूल को छूती हों: नए मतदाता, नाम हटाना और वह आईटी प्रणाली जो पूरी मतदाता सूची को सुरक्षित रखती है।
1. शक्तियों का केंद्रीयकरण
आप कानूनी रूप से वोट देने के हकदार हो सकते हैं, लेकिन अब आप "सिस्टम की बाधा" से टकरा सकते हैं। आपका निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) आपके अधिकार को सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि डिजिटल सिस्टम पर नियंत्रण केंद्रित कर दिया गया है। दिल्ली की एक टीम अब यह रोक सकती है, रद्द कर सकती है या ओवरराइड कर सकती है कि जमीनी स्तर के अधिकारी क्या करते हैं।
2. अगली पीढ़ी पर SIR का साया
फॉर्म-6 में किया गया बदलाव, जिस पर चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई है, नए मतदाताओं से यह बताने के लिए कहता है कि क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी पिछली SIR की सूची में हैं। एक तीखे विवादित SIR में माता-पिता का नाम हटाया जाना अब उनके बच्चे पर भी असर डालेगा। एक महत्वपूर्ण फॉर्म जो यह तय करता है कि नया मतदाता कौन है, उसे सरकार द्वारा नियमों में संशोधन किए बिना बदल दिया गया, जैसा कि कानून चाहता है।
3. सुरक्षा उपायों का क्षरण
EC के भीतर विकेंद्रीकरण खुद इसका सबसे मजबूत सुरक्षा उपाय था। दशकों से आयोग ने मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों का एक ही बुनियादी तर्क से जवाब दिया है: कोई एक व्यक्ति या टीम सूची को नियंत्रित नहीं करती है। निर्वाचन क्षेत्र दर निर्वाचन क्षेत्र, हजारों वैधानिक अधिकारी ऐसा करते हैं। दो चुनाव आयुक्तों ने शिकायत की है कि वह सुरक्षा उपाय तब कमजोर हो जाता है जब डिजिटल सिस्टम पर नियंत्रण केंद्रित होता है।
4. चेक्स एंड बैलेंसेस का चरमराना
ECI तीन सदस्यीय संवैधानिक निकाय है। इसका कानून प्रदान करता है कि कामकाज, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से निपटाया जाना चाहिए और जहां सदस्य भिन्न हों, बहुमत से। फिर भी चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने बार-बार दर्ज किया कि आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों के बारे में उनसे परामर्श नहीं किया गया या उन्हें सूचित नहीं किया गया।
5. चुनाव आयोग के जनादेश का उल्लंघन
आयोग के भीतर पहले भी असहमति रही है, लेकिन यह असहमति बहुत अलग है।
जनवरी 2009: मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालास्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पक्षपातपूर्ण आचरण के आरोप में हटाने की सिफारिश की थी। मनमोहन सिंह सरकार ने 1 मार्च 2009 को यह सिफारिश खारिज कर दी थी और चावला अप्रैल में CEC बने थे।
मई 2019: लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण से कुछ दिन पहले चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने CEC सुनील अरोड़ा को लिखा था कि जब तक आचार संहिता की शिकायतों पर उनके अल्पसंख्यक फैसलों को अंतिम आदेशों में दर्ज नहीं किया जाता, तब तक वह आयोग की बैठकों में शामिल होना बंद कर देंगे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को दी गई 'क्लीन चिट' से असहमति जताई थी। 21 मई 2019 को पूर्ण आयोग ने 2-1 से निर्णय लिया कि असहमति को फाइल में दर्ज किया जाएगा, आदेशों में नहीं।
चावला और लवासा दोनों मामलों में, असहमति किसी व्यक्ति द्वारा उठाए गए एक विशिष्ट मुद्दे के आसपास थी। हालांकि, इस बार, बहुमत बनाने वाले दो आयुक्त उन फैसलों पर असहमत नहीं हो रहे हैं जिन पर उन्हें दरकिनार (overrule) किया गया है। वे रिकॉर्ड पर रख रहे हैं कि फैसले लिए गए, आदेश जारी किए गए और मामले दायर किए गए, और वे अंधेरे में हैं। स्पष्ट रूप से, जिस आयोग से 2023 का अधिनियम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से कार्य करने की अपेक्षा करता है, उसने ऐसा नहीं किया है।

10 महीने, 14 नोट्स: ऑन-रिकॉर्ड आपत्तियां
इनमें से 5 नोट्स मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी कॉपी किए गए थे:
18 अक्टूबर 2025 (संधु): आयोग के अनुमोदन के बिना EC के नाम पर पत्र और आदेश जारी किए जा रहे हैं।
16 अप्रैल 2026 (संधु): मीडिया के माध्यम से नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल के बारे में पता चल रहा है।
16 अप्रैल 2026 (संधु): आयोग की मंजूरी के बिना आधिकारिक पत्र/संचार जारी किए गए।
16 अप्रैल 2026 (जोशी): बैठकों के 1 साल से अधिक समय बाद तक कार्यवृत्त (minutes) न मिलना।
16 अप्रैल 2026 (जोशी): आयोग की मंजूरी के बिना अधिकारी विदेशी दौरों पर जा रहे हैं।
24 अप्रैल 2026 (जोशी): बिना मंजूरी के आधिकारिक संचार जारी होने की बात दोहराई।
16 मई 2026 (जोशी): सरकारी मंजूरी (नियमों में संशोधन) के बिना फॉर्म-6 (नए वोटर) को न बदला जाए; संधु ने 19 मई को सहमति जताई।
29 मई 2026 (जोशी): चेतावनी दी कि वोटर लिस्ट डेटाबेस का केंद्रीयकरण हो रहा है, ऑडिट की जरूरत है। संधु ने 13 जुलाई को समर्थन किया।
29 जुलाई 2026 (जोशी - कैबिनेट सचिव को): अधिकारी आयोग की जानकारी के बिना काम का बंटवारा कर रहे हैं।
29 जुलाई 2026 (संधु - कैबिनेट सचिव को): कार्य रोस्टर मुद्दे को दोहराया, अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
30 जुलाई 2026 (जोशी व संधु): काम के नए आवंटन आदेश को खारिज किया।
12 अगस्त 2026 (संधु): पश्चिम बंगाल के ट्रिब्यूनल के समक्ष EC की ओर से अपीलों को किसने अधिकृत किया?
13 अगस्त 2026 (संधु): फॉर्म-6 में बदलाव अनधिकृत और गैर-कानूनी है।
14 अगस्त 2026 (संधु): फील्ड अधिकारी ECINet सिस्टम तक पहुंच नहीं बना पा रहे हैं। DG(IT) के पास पहुंच को प्रतिबंधित करने की कोई शक्ति नहीं है।

जानिए दोनों चुनाव आयुक्तों के बारे में
सुखबीर सिंह संधु
वह 15 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त के रूप में शामिल हुए। उत्तराखंड काडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी, उन्होंने जुलाई 2021 से जनवरी 2024 तक उत्तराखंड के मुख्य सचिव के रूप में कार्य किया। उससे पहले, 2019 से 2021 तक, वह भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के अध्यक्ष थे। फरवरी 2024 में, उन्होंने कुछ समय के लिए लोकपाल के सचिव के रूप में कार्य किया। उन्होंने हरिद्वार, गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) और उधम सिंह नगर जिलों के कलेक्टर के रूप में भी काम किया। वह 2007 और 2014 के बीच तीन राजनीतिक दलों के चार मुख्यमंत्रियों के प्रमुख सचिव रहे। संधु ने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, अमृतसर से एमबीबीएस किया है और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर से इतिहास में मास्टर डिग्री ली है। वह कानून स्नातक (LL.B.) भी हैं।
विवेक जोशी
वह 19 फरवरी 2025 को चुनाव आयुक्त के रूप में शामिल हुए। हरियाणा काडर के 1989 बैच के आईएएस अधिकारी, उन्होंने हरियाणा के मुख्य सचिव के रूप में कार्य किया। उन्होंने कपड़ा, महिला एवं बाल विकास और वित्त मंत्रालयों में भी सेवाएं दी हैं। हरियाणा में, वह जींद, हिसार और पंचकूला के उपायुक्त और अंबाला के संभागीय आयुक्त थे। वह भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय स्टेट बैंक के बोर्ड सदस्य रह चुके हैं। जोशी के पास ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट, जिनेवा से अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र में पीएचडी और रुड़की विश्वविद्यालय (अब आईआईटी रुड़की) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.ई. (1987) की डिग्री है।

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1. साभार एवं मूल स्रोत (Source & Acknowledgment): यह विशेष रिपोर्ट दैनिक समाचार पत्र 'द इंडियन एक्सप्रेस' (The Indian Express) में 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित पत्रकार रितिका चोपड़ा और दामिनी नाथ की खोजी और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ('14 times in 10 months, two election commissioners objected on record to steps taken by commissioner') पर आधारित है। फोटो और मूल खबर में उल्लिखित सभी तथ्यात्मक जानकारियां, दस्तावेज और संदर्भ 'द इंडियन एक्सप्रेस' से साभार लिए गए हैं।
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