जो ना डरती है, ना बिकती है - उस जुझारू कौम का नाम वामपंथ है! कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में वामपंथी छात्र संगठनों के संयुक्त सम्मेलन में छात्रों और युवाओं का भारी सैलाब उमड़ पड़ा। एबीवीपी की धमकियों और बाधाओं को दरकिनार कर आयोजित इस कन्वेंशन में आईसा (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा, एसएफआई (SFI) के महासचिव सृजन भट्टाचार्य सहित प्रमुख छात्र नेताओं ने हिस्सा लिया। छात्र नेताओं ने केंद्र व राज्य सरकार की दमनकारी नीतियों, एसआईआर (SIR), शिक्षा के बाजारीकरण और शैक्षणिक संस्थानों पर हो रहे हमलों के खिलाफ एकजुट होकर प्रतिरोधी आंदोलन तेज करने का आह्वान किया। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि वामपंथ की ऐतिहासिक विरासत कभी घुटने टेकना नहीं सीखती और लोकतंत्र व संविधान की रक्षा के लिए यह संघर्ष आखिरी सांस तक जारी रहेगा।
संघ के हमलों और धमकियों को दरकिनार कर जादवपुर में उमड़ा छात्रों का सैलाब
वामपंथी छात्र संगठनों ने फूंका प्रतिरोध का बिगुल
कोलकाता/जादवपुर, 05 अक्टूबर। फासीवादी ताकतों की धमकियों, हमलों और दमनकारी नीतियों के खिलाफ जादवपुर विश्वविद्यालय (JU) के प्रांगण में वामपंथी छात्र आंदोलन ने अपनी अटूट एकजुटता और प्रतिरोध का ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। 'जेनजी आंदोलन: पीढ़ी और प्रतिरोध की एकता' (Gen-Z Movement: Generation and Unity of Resistance) विषय पर आयोजित वामपंथी छात्र संगठनों के संयुक्त कन्वेंशन में एबीवीपी (ABVP) और दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा पैदा की गई तमाम बाधाओं व आशंकाओं को पीछे छोड़ते हुए हजारों की संख्या में छात्र-छात्राएं उमड़ पड़े।
सोमवार को सुबह कार्यक्रम की शुरुआत में ही आयोजकों को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। एबीवीपी के विरोध पत्र और हमले की आशंकाओं के बावजूद छात्रों की अप्रत्याशित भीड़ उमड़ पड़ी। जादवपुर विश्वविद्यालय के 'के पी बोस मेमोरियल हॉल' में जब जगह कम पड़ गई और हॉल के बाहर छात्रों की कतारें लंबी होती चली गईं, तो आयोजकों को बीच में ही कार्यक्रम का स्थान बदलकर इसे 'गांधी भवन' के खुले प्रांगण में स्थानांतरित करना पड़ा। पूरे दिन गाँधी भवन परिसर छात्रों के नारों, प्रतिरोध और क्रांतिकारी ऊर्जा से गूंजता रहा।
जनसभा में मंच पर उपस्थित प्रमुख और वक्ता
इस विशाल छात्र कन्वेंशन में राज्य और देश के अग्रणी शैक्षणिक संस्थानों से आए छात्र प्रतिनिधियों और छात्र नेताओं ने भाग लिया। मंच पर प्रमुख रूप से उपस्थित थे -
नेहा बोरा – सर्वभारतीय अध्यक्ष, आइसा (AISA), सृजन भट्टाचार्य – पूर्व महासचिव व वरिष्ठ छात्र नेता, एसएफआई (SFI), देदीप्य गांगुली – राज्य संयोजक, सीजेपी (CJP), आफरीन बेगम – सचिव, जादवपुर विश्वविद्यालय रिसर्च स्कॉलर्स एसोसिएशन (JURSA), शिल्पी आफरीन – छात्र प्रतिनिधि, जादवपुर विश्वविद्यालय, रुसम हजारिका – अध्यक्ष, छात्र संसद, सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI), प्रतिनिधिगण – इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (ISI) एवं अन्य वामपंथी छात्र संगठन।
"जो ना डरती है, ना बिकती है - उस कौम का नाम वामपंथ है"
नेहा बोरा का ऐतिहासिक संबोधन
कन्वेंशन को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए आइसा (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने अपने 16 मिनट से अधिक लंबे भाषण में सत्ता में बैठे फासीवादी तत्वों, आरएसएस और भाजपा को तीखे शब्दों में आड़े हाथों लिया।
1. हिंसा के जरिए झुकाने की साजिश और वामपंथ की विरासत:
नेहा बोरा ने कहा, "सत्ता का गुरूर पाले बैठे लोगों को लगता है कि वे मार-पीटकर, दमन करके हमें घुटनों पर ला सकते हैं। उन्हें लगता है कि जंतर-मंतर को रिक्लेम कर रहे लोगों को पीटकर झुकाया जा सकता है; जादवपुर पर एक के बाद एक हमले करके और एसआरएफटीआई (SRFTI) जैसे छोटे संस्थानों पर जानलेवा हमले करके उन्हें खामोश किया जा सकता है। लेकिन वे नहीं जानते कि जो लोग छात्र आंदोलनों और जन-आंदोलनों को आबाद किए हुए हैं, वे वामपंथ की विरासत से आते हैं। हमें कभी घुटनों पर नहीं लाया जा सकता। हमारी विरासत वियतनाम, क्यूबा, लैटिन अमेरिका और ईरान की जन-क्रांतियों की विरासत है।"
2. जादवपुर और विचार की राजनीति पर हमला:
जादवपुर के बाहर प्रदर्शन करने वालों पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा, "जो लोग जादवपुर के बाहर नंगे होकर तमाशा करते हैं, उन्हें क्या पता कि जादवपुर के अंदर किताबों और विचारों की राजनीति करने वाले छात्रों का हौसला क्या है! जिस वामपंथ को ये मिट्टी में मिलाने की बात करते हैं, उसने इतिहास में बड़े से बड़े तानाशाहों को कुर्सी से घसीटकर जमीन पर पटका है।"
3. एसआईआर (SIR), मताधिकार और लोकतंत्र की रक्षा:
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार बंगाल पर लोहे के हाथों (Iron Fist) से राज करने के लिए 'एसआईआर' (SIR) जैसी विशेष साजिशें रच रही है।
"डेमोक्रेसी कोई कागजी या अमूर्त शब्द नहीं है; यह आजादी की लड़ाई में आम जनता और स्वतंत्रता सेनानियों से किया गया एक प्रॉमिस (वादा) था। लोकतंत्र में आम आदमी का सबसे बड़ा हथियार उसका 'वोट देने का अधिकार' होता है। जब आप धोखा करके हमसे हमारा वोट छीन लेते हैं, तो आप लोकतंत्र की आत्मा को छीन लेते हैं। इस संविधान को बनाने में आपके पूर्वजों का कोई योगदान नहीं था, हमारे पूर्वजों ने हंसते-हंसते कुर्बानियां दी थीं। इसीलिए आपको इसे तार-तार करने में दर्द नहीं होता, लेकिन इस देश की जनता इसे लहूलुहान नहीं होने देगी।"
4. बंगाल में हिंसा, मॉब लिंचिंग और बुलडोजर राज:
बंगाल की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में लगातार मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) की घटनाएं अंजाम दी जा रही हैं। “हम देखते हैं कि अब्दुल, जो एक स्कूल ठीक करने की मुहिम में शामिल होते हैं, उनके पिता की भीड़ द्वारा हत्या कर दी जाती है। एसआरएफटीआई (SRFTI) में जब छात्र कहते हैं कि यह छात्रों का संस्थान है और यहाँ आरएसएस के कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं है, तो उन पर हमले किए जाते हैं। आरएसएस-भाजपा को शिक्षा, रोजगार या इंफ्रास्ट्रक्चर से कोई लेना-देना नहीं है; वे केवल हुलिगनिज्म (गुंडागर्दी) जानते हैं और जनादेश का झूठा दम भरकर हिंसा को सही ठहराते हैं।”
5. "दस्ते-नातवां" (कमजोर हाथ) और प्रतिरोध का संकल्प:
उत्तराखंड से संबंध रखने वाली नेहा बोरा ने एक मशहूर शेर का हवाला दिया: "छोटी सी एक कौम ने हिम्मत ही तोड़ दी, एक दस्ते-नातवां ने तो कलाई मरोड़ दी।"
उन्होंने इसका अर्थ समझाते हुए कहा, "वियतनाम में साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने वाले लोगों के लिए यह लिखा गया था। सत्ताधीश सोचते हैं कि किताब पढ़ने वाले, भाषण देने वाले लेफ्ट के लोग क्या चुनौती देंगे? उन्हें दिखा दो कि भले ही हमारी भाषा में शिष्टता (finesse) और विचारों में बौद्धिक प्रखरता हो, लेकिन जब बात संघर्ष और जीने-मरने की आएगी, तो हम उनका हाथ मरोड़कर उनकी ताकत को जमीन पर बिखेर देंगे।"
(यह मूल शेर अल्लामा इक़बाल की मशहूर नज़्म 'शिकवा' (Shikwa) से है - "छोटी सी एक कौम ने हसरत ही तोड़ दी, एक दस्ते-नातवां ने तो कलाई मरोड़ दी", नेहा बोरा ने अपने भाषण में इसे अपने अंदाज और अर्थ में खूबसूरती से ढाला - सं । )
उन्होंने अपने भाषण का समापन मशहूर इंकलाबी पंक्तियों के साथ किया— "ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन... ये दिन भी जाएंगे गुजर।" उन्होंने कहा कि फासीवादी भाजपा और आरएसएस, जिनकी जगह हमेशा से इतिहास के कूड़ेदान में रही है, उन्हें जल्द ही वापस वहीं फेंक दिया जाएगा।
"गोडसे की पूजा करने वाले तांडव कर रहे हैं": सृजन भट्टाचार्य
एसएफआई (SFI) नेता सृजन भट्टाचार्य ने अपने भाषण में केंद्र व राज्य की मौजूदा परिस्थितियों पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। सृजन ने कहा कि "आजादी के 80 साल बाद आज देश को फिर से अंधकार युग में धकेला जा रहा है। नागरिक अपने वोट देने का अधिकार खोते जा रहे हैं। हमने कभी नहीं सोचा था कि देश में ऐसा दिन देखना पड़ेगा जहाँ नाथूराम गोडसे की तस्वीर पर माला चढ़ाने वाले लोग सड़कों पर तांडव करेंगे, और दूसरी तरफ हमें गाँधीजी और आंबेडकर की तस्वीरें हाथ में लेकर अपने बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा होना पड़ेगा।" उन्होंने कहा कि आज के बंगाल में बदहाली का ऐसा माहौल बन गया है जहाँ नेताजी सुभाष चंद्र बोस को गुंडा या अपशब्द कहने वाले आसानी से बच निकलते हैं, जबकि ढोंगी-फर्जी बाबाओं के खिलाफ आवाज उठाने और विरोध करने पर जेल भेज दिया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रवींद्रनाथ टैगोर, बी.आर. आंबेडकर और महात्मा गांधी की जो विरासत हमने हासिल की थी, उस विरासत को बचाने के लिए ही आज यह युवा पीढ़ी (Gen-Z) एक साथ मैदान में उतरी है।
शैक्षणिक संस्थानों के संकट, निजीकरण और शोधकर्ताओं का मुद्दा
कन्वेंशन में राज्य के प्रमुख संस्थानों से आए छात्र प्रतिनिधियों ने शिक्षा व्यवस्था पर हो रहे हमलों को तथ्यों के साथ रेखांकित किया:
JURSA की सचिव आफरीन बेगम ने जादवपुर विश्वविद्यालय और राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में शोध के बदहाल बुनियादी ढांचे, प्रयोगशाला उपकरणों की कमी और रिसर्च फंड में की जा रही भारी कटौती पर तीखे सवाल उठाए। छात्र नेताओं ने आरोप लगाया कि जादवपुर जैसे एक्सीलेंस (उत्कृष्टता) के केंद्रों को तबाह करने की साजिश रची जा रही है, क्योंकि यहाँ कम खर्च में समाज के गरीब और जरूरतमंद (marginalized) परिवारों के बच्चे भी उच्च शिक्षा पाते हैं। इसी अवसर पर शिक्षकों के लिए लाए गए दंडात्मक स्थानांतरण बिल का भी कड़ा विरोध किया गया। एसआरएफटीआई छात्र संसद के अध्यक्ष रुसम हजारिका ने कहा कि आरएसएस के फासीवादी हमले चाहे कितने भी तेज क्यों न हों, वे छात्रों की सोच, कल्पना, विचारधारा या उनके नवोन्मेष को दबा नहीं सकते। कला और सिनेमा के माध्यम से हर हमले का करारा जवाब दिया जाएगा। इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (ISI) के प्रतिनिधियों ने 'आईएसआई बिल' का पर्दाफाश करते हुए बताया कि कैसे सरकार मुफ़्त शिक्षा देने वाले इस प्रतिष्ठित संस्थान का कॉरपोरेटाइजेशन और बाजारीकरण करके इसे निजी हाथों में सौंपने की कोशिश कर रही है।
प्रोग्रेसिव बंगाल और एकजुट वाम आंदोलन का आह्वान
कन्वेंशन के अंत में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर सभी प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और वामपंथी ताकतों को फासीवाद, सांप्रदायिकता और शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ एक मंच पर आना होगा। जादवपुर विश्वविद्यालय की धरती से शुरू हुआ यह 'जेन-जी' का प्रतिरोध आंदोलन आने वाले दिनों में पूरे बंगाल और देश भर में तानाशाही के खिलाफ निर्णायक मोड़ साबित होगा।
साभार: नेहा बोरा के भाषण का विडिओ यहाँ क्लिक कर देख सकते हैं।
स्रोत: बांग्ला दैनिक गणशक्ति । 06.10.2026
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