लोकतंत्र में जनता का अधिकार नहीं दबेगा! दिल्ली में 10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन से पहले ट्रेनों के रद्द होने, मेट्रो स्टेशनों के बंद होने और इंटरनेट पर पाबंदियों के खिलाफ सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। कोर्ट में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने प्रशासन के इस रवैये पर सवाल उठाते हुए इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन का हनन बताया। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि नागरिकों के संगठित होने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार मौलिक है। अब कोर्ट ने प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए आयोजकों से अतिरिक्त जानकारी मांगी है।

विरोध प्रदर्शन: दिल्ली में पाबंदियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची सीपीआईएम
विरोध प्रदर्शन से ठीक पहले दिल्ली में थोपी गई अतार्किक और दमनकारी पाबंदियों को एम. ए. बेबी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी
नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के कल के प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में एक के बाद एक पाबंदियां लगाने का फैसला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले दिल्ली में लागू की गई पाबंदियों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। एम. ए. बेबी द्वारा दायर इस याचिका में दिल्ली आने वाली ट्रेनों को रद्द करने, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने और धारा 163 (बीएनएसएस) लागू करने जैसे कदमों को नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया गया है।
"मेरे देश में यह क्या हो रहा है?" - सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल का तीखा सवाल
इस मामले में एम. ए. बेबी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील और सांसद कपिल सिब्बल पैरवी कर रहे हैं। शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष राजधानी की परिवहन व्यवस्था को व्यावहारिक रूप से ठप कर देने का आरोप लगाते हुए उन्होंने अदालत से हस्तक्षेप की मांग की। सिब्बल ने अदालत के समक्ष बेहद तल्ख लहजे में कहा, "सभी ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं, मेट्रो स्टेशन बंद हैं। कोई कहीं नहीं जा सकता। आखिर मेरे देश में यह क्या हो रहा है? यह तो पूरी तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शन है।" उन्होंने प्रदर्शन से पहले राजधानी में व्यापक पाबंदियां लगाने के औचित्य पर सवाल उठाया। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने भी इस कदम की आलोचना करते हुए कहा, "आप अपनी अक्षमता के कारण पूरे शहर को बंद नहीं कर सकते।"
16 पन्नों के दस्तावेज़ में बेनकाब हुआ पुलिस का दमनकारी तंत्र
शनिवार को ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर सीजेपी के प्रदर्शन का आह्वान किया गया है। दिल्ली पुलिस ने उस कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी है। प्रदर्शन को देखते हुए 57 मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियां और दिल्ली आने वाली कई ट्रेनों को रद्द करने का फैसला लिया गया है। सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी ने दायर अपनी याचिका में इन कदमों की वैधता और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े सवालों को प्रमुखता दी है।
अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से 16 पन्नों का एक विस्तृत दस्तावेज़ पेश किया गया। इसमें दिल्ली पुलिस के तुगलकी निर्देशों, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत जारी ज्ञापनों, ट्रेनों के रद्द होने और ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं पर लगाई गई रोक से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों को शामिल किया गया है। इसके अलावा, दस्तावेज़ में यह भी उजागर किया गया है कि किस तरह प्रदर्शन से पहले धार्मिक स्थलों, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (RWA), होटलों और हॉस्टलों में पुलिसिया छापेमारी और पूछताछ के जरिए खौफ का माहौल बनाया गया। वकीलों ने अदालत को साफ बताया कि आयोजकों ने नियमानुसार पुलिस से इजाजत मांगी थी, लेकिन उसे असंवैधानिक तरीके से खारिज कर दिया गया।
विरोध का अधिकार मौलिक है, इसे खत्म नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जयमाल्या बागची ने प्रदर्शन और सभा करने के अधिकार के महत्व को स्वीकार किया। उन्होंने टिप्पणी की कि विरोध कार्यक्रम कानून के दायरे में ही होने चाहिए, लेकिन लोकतंत्र में लोगों के विरोध करने के अधिकार को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा, "संगठित होने का अधिकार निश्चित रूप से मौजूद है, बशर्ते उसका उपयोग कानून के दायरे में हो।" संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए जस्टिस बागची ने कहा, "यदि हम इन पाबंदियों को सही ठहराते हैं, तो यह नागरिकों के संगठित होने के अधिकार में बाधा डालेगा। क्या यह उचित होगा? बिल्कुल नहीं, क्योंकि विरोध करने का अधिकार मौलिक है।" पीठ ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे आयोजकों और संभावित प्रतिभागियों की संख्या के संबंध में और अधिक तथ्य और विस्तृत जानकारी एकत्र कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। वकीलों ने आश्वस्त किया कि वे जल्द ही अतिरिक्त विवरण के साथ अदालत में पूरी जानकारी रखेंगे।
जन-अधिकारों की रक्षा में वामपंथी संघर्ष जारी
10 अक्टूबर के कार्यक्रम से पहले दिल्ली में ट्रेनें रद्द करने, मेट्रो स्टेशन बंद करने, इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी और पुलिस द्वारा अनुमति न देने - इन सभी ने मिलकर नागरिक स्वतंत्रता और जन-सुरक्षा के सवाल पर एक बहस छेड़ दी है। सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी के सुप्रीम कोर्ट जाने से इन पाबंदियों के खिलाफ कानूनी चुनौती को एक और महत्वपूर्ण आयाम मिला है।
वामपंथ देश के हर नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों और शांतिपूर्ण प्रतिवाद के अधिकार के साथ मजबूती से खड़ा है। अब सभी की नजरें इस सवाल पर टिकी हैं कि एक तरफ प्रशासन के कानून-व्यवस्था बनाए रखने के तर्क और दूसरी तरफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन व संगठित होने के अधिकार के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाएगा।
साभार: बांग्ला गणशक्ति ऑन लाइन। 09.10.2026 फोटो: इंटरनेट स्टॉक
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...