"वोट के अधिकार पर हमला बंद करो, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बहाल करो!" मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालों और मतदाता सूचियों से नाम छांटने की मनमानी के बीच देश में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के सनसनीखेज खुलासे के बाद सीपीआई (एम) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।

'ज्ञानेश' हटाओ, 'एसआईआर' रोको : एम.ए. बेबी
चुनावी निष्पक्षता और लोकतंत्र की रक्षा के लिए उठ रही हैं देशव्यापी आवाजें

देश की राजधानी दिल्ली में इन दिनों एक बार फिर लोकतंत्र की बुनियादी साख को बचाने की गूंज सुनाई दे रही है।
'इंडियन एक्सप्रेस' में प्रकाशित एक सनसनीखेज और तथ्यपरक खोजी रिपोर्ट के सामने आने के बाद, मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के इस्तीफे और एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को रोकने की मांग तेज हो गई है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस गंभीर मुद्दे पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे विपक्षी राजनीतिक दलों और जन संगठनों के नेताओं व कार्यकर्ताओं को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिया जा रहा है, जबकि वे सरकार द्वारा अधिकृत प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर पर एकत्रित हुए थे।
निष्पक्षता के मोर्चे पर गंभीर सवाल
किसी भी लोकतंत्र के जीवंत होने की सबसे बड़ी कसौटी यह होती है कि वहां चुनाव किस तरह कराए जा रहे हैं। इसमें चुनाव कराने वाली संस्था की पारदर्शिता, उसकी निष्पक्षता और उसकी जवाबदेही सबसे अहम होती है। पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. सेशन के कार्यकाल के तौर-तरीकों को लेकर भले ही तमाम बातें कही जाती रही हों, लेकिन चुनाव आयोग की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रामाणिकता हमेशा जनता के सामने स्पष्ट थी।मगर, जब से ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला है, स्थिति इसके ठीक विपरीत नजर आ रही है। आलोचकों का आरोप है कि मतदाता सूचियों से नाम छांटने में उनकी भूमिका बेहद मनमानी और एकतरफा रही है। भारत रत्न सी.एन. राव और जाने-माने अभिनेता-फिल्मकार प्रकाश राज तक के मताधिकार को इस तरह की प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ा है।
आयोग के भीतर से ही उठे गंभीर मतभेद
'इंडियन एक्सप्रेस' में 23 सितंबर को छपी रीतिका चोपड़ा की खोजी रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि चुनाव आयोग के भीतर से ही मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर-तरीकों पर सवाल उठने लगे थे। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर कड़ी आपत्ति जताई, जो उनकी जानकारी के बिना आयोग के नाम पर लिए और जारी किए गए थे। ये सभी आपत्तियां आधिकारिक तौर पर दर्ज हैं, जिनमें से दो मामले कैबिनेट सचिव तक भी पहुंचे थे। मामले की गंभीरता का अंदाज़ा इन बातों से लगाया जा सकता है -
फॉर्म-6 में मनमाना बदलाव: जुलाई में फॉर्म-6 (जिसके जरिए मतदाता सूची में नाम जोड़ा जाता है) में यह जानकारी अनिवार्य करने को कहा गया कि आवेदक के पिता या दादा का नाम अंतिम एसआईआर के समय मतदाता सूची में था या नहीं। जबकि मई में ही विवेक जोशी ने चेतावनी दी थी कि इसके लिए मतदाता पंजीकरण नियमों में संशोधन जरूरी है। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इसे विधिविहीन और गैर-कानूनी करार दिया था।
डेटा का केंद्रीकरण: विवेक जोशी ने चेतावनी दी थी कि मतदाता सूची के डेटाबेस का अत्यधिक केंद्रीकरण किया जा रहा है, और संधू ने स्पष्ट किया था कि स्टैचुटोरी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) के अधिकारों को कम करने का अधिकार आयोग के आईटी विंग प्रमुख को नहीं है।
पश्चिम बंगाल का विशेष उदाहरण और प्रशासनिक मनमानी
पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल के पास 38 लाख आवेदन लंबित पड़े हैं, जिनमें से 16 लाख 10 हजार आवेदन खुद आयोग ने किए हैं और उन्हीं के कहने पर उन मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। जब आयुक्त संधू ने यह जानना चाहा कि ये आवेदन किसने किए, तो उन्हें, विवेक जोशी या राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) तक को इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। पिछले साल अप्रैल में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान जब पश्चिम बंगाल का दौरा किया गया, तो ऐसे कई चुनाव अधिकारियों के नाम भी मतदाता सूची से गायब मिले जो खुद चुनाव संपन्न कराने की ड्यूटी पर तैनात थे। 'द स्टेट्समैन' जैसे राष्ट्रीय अखबारों में भी यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के जरिए 91 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जो कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है। इनमें से 27 लाख नाम केवल 'लॉजिकल डिस्ड्रेपेंसी' (तार्किक विसंगति) के नाम पर हटाए गए, जो शब्द खासतौर पर सिर्फ पश्चिम बंगाल के लिए ही इस्तेमाल किया गया था। चुनाव परिणामों के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया कि करीब 49 विधानसभा क्षेत्रों में जितने नाम काटे गए थे, उनकी संख्या जीत के अंतर से कहीं अधिक थी। इनमें से 26 सीटें भाजपा ने, 21 सीटें तृणमूल कांग्रेस ने और 2 सीटें कांग्रेस ने जीतीं, जबकि 2021 के चुनावों में इन्हीं 48 सीटों पर तृणमूल का कब्जा था।
स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका और आयोग की सफाई
मौजूदा दौर में जब स्वतंत्र और खोजी मीडिया पर तमाम तरह के दबाव की चर्चाएं आम हैं, 'इंडियन एक्सप्रेस' ने यह साबित कर दिया है कि देश में खोजी पत्रकारिता अभी भी जीवित है और सत्ता के गलियारों तक अपनी गूंज पहुंचा रही है। अखबार के खुलासे के बाद चुनाव आयोग की तरफ से जो स्पष्टीकरण या सफाई दी गई, उसमें मुख्य मुद्दों पर चुप्पी साध ली गई। सबसे बुनियादी बात यह थी कि बैठकों से पहले एजेंडा सभी सदस्यों को भेजा जाए और बैठक के बाद कार्यवृत्त (मिनट्स) संबंधित पक्षों तक पहुंचे - यह एक ऐसा सामान्य नियम है जो हर छोटा-बड़ा संगठन मानता है, लेकिन आयोग इसे भी दरकिनार करता नजर आया।

नियुक्ति प्रक्रिया और संवैधानिक बेंच के निर्देशों की अनदेखी
स्वतंत्रता के बाद से ही देश में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कोई पुख्ता और पारदर्शी कानून संसद द्वारा नहीं बनाया जा सका। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार तब तक दिया गया था जब तक संसद इस पर कोई कानून न बना ले। वर्ष 2023 के मार्च महीने में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को केवल कार्यपालिका के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने निर्देश दिया था कि प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की एक समिति की सलाह पर राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करेंगे। किंतु, केंद्र सरकार ने इस पारदर्शी व्यवस्था को कानूनी रूप देने के बजाय एक नया कानून लाकर नियुक्ति प्रक्रिया को एकतरफा बना दिया, जहां कार्यपालिका का प्रभाव दो-तिहाई हो गया और विपक्ष की भूमिका महज एक दर्शक की रह गई।
व्यापक जन-आंदोलन की पुकार
ज्ञानेश कुमार के कार्यप्रणाली और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की इस प्रकार की अनदेखी से यह मांग और जोर पकड़ने लगी है कि यदि थोड़ी भी नैतिकता बची है, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। जब तक वे इस पद पर हैं, आयोग की निष्पक्षता और गरिमा पर सवाल बने रहेंगे। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम समेत तमाम वामपंथी दल (सीपीआई, माकपा, भाकपा-माले, एआईएफबी और आरएसपी) और 'इंडिया' गठबंधन के घटक दल इस मुद्दे पर एकजुट हो चुके हैं। सभी गैर-बीजेपी और गैर-एनडीए राजनीतिक ताकतों, बुद्धिजीवियों, लेखकों और आम नागरिकों से यह अपील की जा रही है कि वे ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को रोकने की मांग में शामिल हों। जिन योग्य मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें बहाल किया जाए। देश के हर जिले में संयुक्त विरोध प्रदर्शनों के जरिए लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना को बचाने के इस ऐतिहासिक अभियान को आगे बढ़ाएं।
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 11.10.2026
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...