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आज की तमन्नाएँ - देबादृत आचार्य

राजीव कुमार पाण्डेय•24 जून 20266 मिनट पठन10 बार पढ़ा गया

पलाशी के मैदान ने हमें सिखाया था — गद्दारी करने से कौम तबाह हो जाती है। आज की तमन्नाएँ हमें सिखा रही हैं — बच्चों के खून से खेलने पर भविष्य तबाह हो जाता है। पलाशी के साज़िशकर्ताओं से हम नफ़रत करते हैं। और आज के समाज के दुश्मन कौन हैं? जो बच्चों की लाशों पर राजनीति करते हैं, जो सांप्रदायिकता का ज़हर फैलाते हैं, जो बुलडोज़र से गरीबों के सपने तोड़ते हैं — वही आज के मीरजाफ़र हैं, वही आज के गद्दार हैं!

आज की तमन्नाएँ - देबादृत आचार्य

पलाशी का मैदान। पलाशी के मैदान में मीर जाफ़रों की साज़िश के कारण सिराजुद्दौला की हार जिस तरह इतिहास के पन्नों में दर्ज है, ठीक उसी तरह इस मिट्टी पर २३ जून को नदिया के कालीगंज में हमारी छोटी सी 'तमन्ना' एक बार फिर घिनौनी राजनीति का शिकार हो गई। उस घटना की आज पहली बरसी है। उस बच्ची की बरसी, जिसके हाथों में तूलिका (ब्रश) थी और आँखों में डॉक्टर बनने का सपना था। आठ साल की वह बच्ची चित्रकारी करना पसंद करती थी, मोहल्ले के छोटे बच्चों को रंग मिलाना सिखाती थी और कहती थी — "बड़ी होकर गरीब काकाओं का मुफ्त में इलाज करूँगी।"

 उपचुनाव की जीत का जुलूस। पटाखों की रोशनी, नारों का तूफान। उसी उल्लास के बीच एक बम। और उस बम के धमाके से बुझ गया एक अधूरी इच्छा का नाम। तमन्ना का अर्थ ही होता है 'इच्छा'। लेकिन वही इच्छा राजनीति के इस विनाशकारी खेल की बलि चढ़ गई। क्या यही आज़ाद बंगाल की तस्वीर है? सदियाँ बीत गईं, मगर गद्दारी आज भी ज़िंदा है, बस उसके किरदार बदल गए हैं।

आज एक साल बाद खड़े होकर हम देख रहे हैं — तमन्ना अकेली नहीं है। उसकी तरह "आज की तमन्नाएँ" रोज़ मर रही हैं। कोई बम से, कोई बुलडोज़र से, कोई भूख से, तो कोई लापरवाही से। कालीगंज की तमन्ना को शायद अख़बारों में थोड़ी जगह मिल भी गई, लेकिन जादवपुर, सियालदह और कूचबिहार के जो बच्चे रैलियों के किनारे खड़े होकर टॉफियाँ बटोरने के चक्कर में कुचल जाते हैं, उनका नाम कोई नहीं जानता। वे भी तो तमन्ना ही हैं। उनके पास भी कॉपियाँ-पेंसिलें थीं, चित्र बनाने की इच्छा थी।

राजनीति आज किस स्तर पर उतर आई है, इस पर सोचना बेहद ज़रूरी है। एक पक्ष विकास के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ज़हर फैला रहा है। वे बंगाल को हिंदू-मुस्लिम के दो खानों में बांटना चाहते हैं। ध्रुवीकरण की आग पर अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं। वहीं दूसरा पक्ष जीत के नाम पर जुलूस निकालता है, पटाखे फोड़ता है, और उन्हीं पटाखों के बारूद से एक मासूम बच्ची का शरीर क्षत-विक्षत हो जाता है। एक बच्चे के शव पर खड़े होकर कोई कहता है — "हिंदू खतरे में है", तो कोई कहता है — "जीत हमारी है"।

तमन्ना की मौत के बाद हमने क्या देखा? कैंडल मार्च। पोस्टर। टीवी डिबेट। ज़िम्मेदार कौन? बस यही बहस और विवाद। जांच कमेटी। और फिर? फिर सब शांत। न्याय न मिलने के दुष्चक्र में फाइलें घूम रही हैं। तमन्ना की कॉपी में आधा बना हुआ सूरज आज भी अधूरा है। उसके सपनों के अस्पताल की ईंट आज तक नहीं रखी जा सकी। क्योंकि राजनीति के लिए तमन्ना के जीवन की कीमत एक वोट से भी कम है।

इसके साथ ही, इस मुर्दा राजनीति में खुलेआम 'बुलडोज़र राज' चल रहा है। अवैध होने का ठप्पा लगाकर फेरीवालों (हाकरों) को उजाड़ा जा रहा है। फुटपाथ की दुकानें तोड़ी जा रही हैं। रिक्शेवाले की रोज़ी-रोटी की दुकान को जमींदोज़ किया जा रहा है। घर टूट रहे हैं, सपने टूट रहे हैं। जो पिता अपनी कमाई खोकर अपने बच्चे के स्कूल की फीस नहीं भर पा रहा है, उस पिता का बेटा भी तो आज की तमन्ना है। जो बच्ची इस उजाड़ की धूल फाँकते हुए पढ़ाई छोड़ रही है, वह भी तो तमन्ना है। बम सिर्फ बारूद से नहीं बनते, बुलडोज़र भी एक तरह का बम ही है। वह भी सपनों को तोड़कर मिट्टी में मिला देता है।

तमन्ना की मौत हमारी आँखों में उंगली डालकर दिखाती है — सत्ता की लड़ाई जब चरम पर होती है, तब मासूम जानों की कीमत सबसे कम हो जाती है। बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य; ये सब अब मुद्दे नहीं रह जाते। मुद्दा यह बन जाता है कि तुम किस दल के हो? तुम्हारा धर्म क्या है? यह बंगाल रवींद्रनाथ, नज़रुल और विद्यासागर का बंगाल है, मगर इसी बंगाल में आज बच्चों के खून से राजनीति की होली खेली जा रही है। इससे ज़्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है?

तमन्ना सिर्फ कालीगंज की लड़की नहीं थी। वह बंगाल की बेटी थी। उसके जैसी हज़ारों-लाखों तमन्नाएँ इस भारत देश के सीने पर मौजूद हैं, जो डॉक्टर बनना चाहती हैं, कलाकार बनना चाहती हैं। लेकिन उनके बड़े होने से पहले ही यह घिनौना समाज उन्हें निगल जाता है। कोई राजनीति की बलि चढ़ता है, कोई गरीबी की, तो कोई सिस्टम की।

इसलिए आज के दिन खड़े होकर अगर हम सिर्फ तमन्ना के लिए आँसू बहाएंगे, तो यह हमारी भूल होगी। हमें आज की उन सभी तमन्नाओं के लिए, 'तिलोत्तमा' के लिए रोना होगा। उस बच्चे के लिए रोना होगा जो बुलडोज़र से अपना घर खोकर सड़क पर बैठा है। उस बच्ची के लिए, जिसने सांप्रदायिक दंगों की आग में अपना स्कूल खो दिया है। उस लड़के के लिए, जो अपने फेरीवाले पिता की उजाड़ी गई दुकान के पास खड़े होकर अपना भविष्य ढूँढ रहा है।

तमन्ना के लिए न्याय चाहिए। कातिलों को सज़ा चाहिए। दोषी चाहे जो भी हो, सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन न्याय से भी बड़ी बात यह है कि अब और तमन्नाओं को मरने नहीं दिया जा सकता। हमें एक ऐसा बंगाल चाहिए, जहाँ किसी माँ की गोद बम के धमाके से सूनी न हो। जहाँ जीत के जुलूस से पहले बच्चों की सुरक्षा का जुलूस निकले। जहाँ बुलडोज़र चलने से पहले इंसानों के घरों के कागज़ देखे जाएँ। जहाँ राजनेता वोटों से पहले देश के बच्चों के स्कूलों का हालचाल लें।

पलाशी के मैदान ने हमें सिखाया था — गद्दारी करने से कौम तबाह हो जाती है। आज की तमन्नाएँ हमें सिखा रही हैं — बच्चों के खून से खेलने पर भविष्य तबाह हो जाता है। पलाशी के साज़िशकर्ताओं से हम नफ़रत करते हैं। और आज के समाज के दुश्मन कौन हैं? जो बच्चों की लाशों पर राजनीति करते हैं, जो सांप्रदायिकता का ज़हर फैलाते हैं, जो बुलडोज़र से गरीबों के सपने तोड़ते हैं — वही आज के मीरजाफ़र हैं, वही आज के गद्दार हैं!

तमन्ना, एक आग का नाम है। एक प्रतिवाद का नाम है। वह अकेली नहीं है, उसके साथ आज हज़ारों तमन्नाएँ खड़ी हैं। उनकी अधूरी इच्छाएँ ही हमारे भविष्य का रास्ता बनें। उनके द्वारा खींचे गए उस अधूरे सूरज को हम पूरा करेंगे। उनके सपनों का अस्पताल हम बनाएंगे। यह हमारा वादा है!!!

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साभार: छात्र संग्राम वेबसाइट

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आज की तमन्नाएँ - देबादृत आचार्य

प्रकाशित: 24 जून 2026 • 6 मिनट पठन

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