काकोरी की यह रेल डकैती ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती थी। अगले दिन अखबारों में इस घटना का सनसनीपूर्ण समाचार छपा। 'इंडियन टेलीग्राफ़ ' ने लिखा था कि डकैती में तीन व्यक्ति मारे गए हैं, जिनमें एक गोरा भी है। किंतु यह खबर एकदम गलत थी। घटना के समय कोई गोरा नहीं मारा गया था। जिस गोरे के मारे जाने की अफवाह थी, वह फौजी का मेजर या कर्नल था जिसने गोली चलने के समय अपने डिब्बे के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर ली थीं और उन्हें लखनऊ सुरक्षित पहुँच जाने पर ही खोला था। क्रांतिकारियों का काम जानकर जनता को ऐसे लोगों से सहानुभूति हो गई थी और लोग नए -नए किस्से बुनने लगे थे। वे अपनी कल्पना में क्रातिकारियों की अलग- अलग तस्वीरें बना रहे थे। उनकी दृष्टि में ब्रिटिश सरकार को इस तरह चुनौती देनेवाले लोग देशभक्त और वीर थे। "
काकोरी ट्रेन एक्शन के 101 साल
9 अगस्त 1925
काकोरी कांड :- काकोरी का यह ट्रेन एक्शन ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती थी

9 अगस्त, 1925 की रात्रि। आसमान बादलों से घिरा हुआ था और हल्की बूँदा -बाँदी हो चुकी थी। हथियारों और छेनी -हथौड़ों से लैस वे दस क्रांतिकारी नौजवान सहारनपुर से छूटी आठ डाउन यात्री गाड़ी में शाहजहाँपुर स्टेशन से चढ़ गए। आज उन्हें अपने लक्ष्य की ओर जाना था। वे सर पर कफन बाँधकर एक शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती देने निकल पड़े थे। गिनती में सिर्फ दस थे वे, पर उनके इरादे ऊँचे और मजबूत थे। वे देश की आजादी के लिए क्रांति के रास्ते पर सीना तानकर चले थे, इसलिए आज उन्हें अपने अभियान पर नाज़ था.....
युवकों की टोली में थे अशफ़ाक उल्ला खाँ, मन्मथनाथ गुप्त, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, कुंदल लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारीलाल, मुकुंदीलाल और शचींद्रनाथ बख्शी। नेतृत्व कर रहे थे दल के नेता पं.रामप्रसाद बिस्मिल। सभी क्रांतिकारी अलग - अलग रेल के डिब्बों में चढ़े थे और उनकी जिम्मेदारियाँ निर्धारित कर दी गई थीं। अशफ़ाक उल्ला, शचींद्रनाथ बख्शी और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी द्वितीय श्रेणी के डिब्बे में सवार हुए थे। उनका काम था कि वे निश्चित स्थान पर जंजीर खींचकर गाड़ी खड़ी करेंगे। इस टुकड़ी का नेतृत्व अशफ़ाक कर रहे थे।
गाड़ी ज्यों ही लखनऊ के निकट काकोरी और आलमनगर स्टेशन के बीच पहुँची, द्वितीय श्रेणी में बैठे युवकों ने जंजीर खींचकर उसे खड़ा कर दिया। बिजली की गति से वे सभी युवक डिब्बे से बाहर कूद पड़े और गाड़ी को चारों ओर से घेर लिया। पिस्तौलों से फायर करके मुसाफिरों को सावधान कर दिया गया कि कोई डिब्बों से उतरे या झाँके नहीं। गार्ड के डिब्बे से खजाने का संदूक धक्का देकर उतार लिया गया और गार्ड को पिस्तौल दिखाकर नीचे जमीन पर लेटने की आज्ञा दे दी गई।
अब समस्या यह थी कि खजाने का संदूक कैसे खोला जाए। गार्ड या अन्य किसी के पास उसकी चाबी नहीं रहती थी। ऐसी स्थिति में लोहे की संदूक को छेनी से काटने का प्रयास किया गया। पर उससे काम बना नहीं। अशफ़ाक पहरा देनेवाले चार आदमियों में से एक थे। उन्होंने देखा तो पिस्तौल मन्मथनाथ गुप्त को देकर वे संदूक पर कुल्हाड़े से प्रयास करने लगे और उनकी बलिष्ठ भुजाओं ने कुछ ही क्षणों में संदूक का मुँह खोल दिया। क्रांतिकारियों ने द्रुत गति से संदूक में से रुपयों के थैले निकालकर एक चादर में बाँध लिए।
योजना की प्रशंसा में फूल बरसाने होंगे कि रेल -डकैती का यह काम सिर्फ दस मिट में पूरा हो गया और इतनी बड़ी गाड़ी को दस व्यक्ति लूटने में कामयाब हो गए, जब्कि उस गाड़ी में चौदह मनुष्य ऐसे थे जिनके पास बंदूकें या रायफलें थीं। गाड़ी में दो अंग्रेज फौजी जवान भी थे, पर सब शांत रहे।क्रांतिकारियों ने कह दिया कि मुसाफिरों से न बोलेंगे, सरकार का माल लूटेंगे। इस कारण मुसाफिर भी शांतिपूर्वक बैठे रहे। यात्री समझे कि तीस-चालीस आदमियों ने गाड़ी को घेर लिया है, पर केवल दस युवकों ने ऐसा आतंक फैला दिया था। साधारणत:इस बात पर बहुत से लोग विश्वास करने में भी संकोच करेंगे कि दस नवयुवकों ने गाड़ी खड़ी करके लूट की। जो भी हो, बात वास्तव में यही थी। इन दस कार्यकर्ताओं में अधिकतर तो ऐसे थे जो आयु में 22 के आसपास होंगे और जो शरीर से बहुत बलशाली भी नहीं थे।
काकोरी की यह रेल डकैती ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती थी। अगले दिन अखबारों में इस घटना का सनसनीपूर्ण समाचार छपा। 'इंडियन टेलीग्राफ़ ' ने लिखा था कि डकैती में तीन व्यक्ति मारे गए हैं, जिनमें एक गोरा भी है। किंतु यह खबर एकदम गलत थी। घटना के समय कोई गोरा नहीं मारा गया था। जिस गोरे के मारे जाने की अफवाह थी, वह फौजी का मेजर या कर्नल था जिसने गोली चलने के समय अपने डिब्बे के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर ली थीं और उन्हें लखनऊ सुरक्षित पहुँच जाने पर ही खोला था। क्रांतिकारियों का काम जानकर जनता को ऐसे लोगों से सहानुभूति हो गई थी और लोग नए -नए किस्से बुनने लगे थे। वे अपनी कल्पना में क्रातिकारियों की अलग- अलग तस्वीरें बना रहे थे। उनकी दृष्टि में ब्रिटिश सरकार को इस तरह चुनौती देनेवाले लोग देशभक्त और वीर थे। "
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(अशफ़ाक उल्ला और उनका युग - सुधीर विद्यार्थी)
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