लगभग दो दशक पहले वनाधिकार कानून लागू होने के बाद भी कई आदिवासियों की ज़मीन और लघु वन उपज संबंधी दावे लंबित हैं।
लोकुर ने कहा कि केवल कानून बनाना ही आदिवासियों की सबसे बड़ी समस्या नहीं है, बल्कि उस कानून का लागू होना असली मुद्दा है।
जन समाचार मंच
लगभग दो दशक पहले वनाधिकार कानून लागू होने के बाद भी कई आदिवासियों की ज़मीन और लघु वन उपज संबंधी दावे लंबित हैं।
लोकुर ने कहा कि केवल कानून बनाना ही आदिवासियों की सबसे बड़ी समस्या नहीं है, बल्कि उस कानून का लागू होना असली मुद्दा है।

आदिवासी अधिकारों पर हमले को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जल, जंगल, ज़मीन, जंगल के अधिकार, आरक्षण, शिक्षा, रोज़गार और आदिवासी संस्कृति की रक्षा के लिए आंदोलन को और तेज़ करने का आह्वान आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच (AARAM) ने किया। रविवार को दिल्ली के मावलंकर हॉल में संगठन द्वारा आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिनिधियों ने यह संकल्प जताया।
आदिवासी अधिकार राष्ट्रिय मंच केअध्यक्ष जीतेन्द्र चौधरी कन्वेंशन को संबोधित करते हुए
इस सम्मेलन में 15 राज्यों से लगभग 800 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। किसान, खेत-मजदूर और महिला संगठनों के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। पश्चिम बंगाल से करीब 80 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जिनमें परेश हांसदा, सोनामोनी टुडू आदि प्रमुख थे।
पश्चिम बंगाल की प्रतिनिधि सोनमणि टुडू
उन्होंने विभिन्न चर्चाओं में भाग लिया। पहले सत्र में बंगाल की सोनामोनी टुडू ने विचार रखे और दूसरे सत्र की अध्यक्षता देबलीना हेम्ब्रम ने की।
उद्घाटन सत्र में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने अपना वक्तव्य रखा। इस अवसर पर AARAM के शीर्ष नेता एवं सीपीआई(एम) पोलित ब्यूरो सदस्य जितेंद्र चौधरी, महासचिव पुलिन बिहारी बास्के, सीपीआई(एम) नेता वृंदा करात सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे।
कन्वेंशन का उद्घाटन करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर
न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए कानून होने के बावजूद उनका सही ढंग से क्रियान्वयन न होने पर उन्होंने चिंता जताई। उन्होंने वनाधिकार कानून और पेसा कानून के अनुपालन के मुद्दे पर विशेष बल दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग दो दशक पहले वनाधिकार कानून लागू होने के बाद भी कई आदिवासियों की ज़मीन और लघु वन उपज संबंधी दावे लंबित हैं।
लोकुर ने कहा कि केवल कानून बनाना ही आदिवासियों की सबसे बड़ी समस्या नहीं है, बल्कि उस कानून का लागू होना असली मुद्दा है। वनाधिकार कानून और पेसा कानून सही से लागू न होने के कारण आदिवासियों का ज़मीन व प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार कमज़ोर हो रहा है। उन्होंने ग्राम सभा को दरकिनार कर फैसले लेने की प्रवृत्ति की भी आलोचना की। 2013 के ओडिशा माइनिंग कॉर्पोरेशन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अदालत ने आदिवासी अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों के मामले में ग्राम सभा की राय के महत्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है।
खान परियोजनाओं और औद्योगिक विस्तार के नाम पर आदिवासियों के विस्थापन का मुद्दा भी उनके भाषण में उठा। लोकुर ने आरोप लगाया कि खनन क्षेत्रों में भारी मशीनरी, ट्रकों और अंधाधुंध निर्माण के कारण घर और पेड़-पौधे नष्ट हो रहे हैं, प्रदूषण बढ़ रहा है और लोगों को अपनी बस्तियां छोड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है। रोज़गार के अभाव में झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र जैसे राज्यों के आदिवासी युवाओं के दिल्ली और अन्य शहरों में काम की तलाश में आने की बात भी उन्होंने उठाई।
पूर्व न्यायाधीश ने आदिवासी इलाकों में शिक्षा की स्थिति पर भी चिंता जताई। कई स्कूल बंद होने और बचे हुए स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि अगर स्कूल ही बंद हो जाएंगे, तो आदिवासी बच्चों को पढ़ने का अवसर कैसे मिलेगा? पीने के पानी, शौचालय, शिक्षक, किताबों और पुस्तकालयों की कमी की बात भी उन्होंने रखी।
सम्मेलन में चार प्रमुख विषयों पर अलग-अलग सत्र आयोजित किए गए:
"वनाधिकार कानून को कमज़ोर करना और उन्मूलन"
"आदिवासियों का आरक्षण और रोज़गार से वंचन"
"आदिवासी छात्र-छात्राओं के शिक्षा अधिकारों का हनन"
"नए भारत में आदिवासी पहचान, संस्कृति, भाषा और विश्वास"
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए संवैधानिक आरक्षण गारंटी ठीक से लागू नहीं हो रही है। लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने, शिक्षा के बजट में वृद्धि करने और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा व रोज़गार के अवसर बढ़ाने की मांग की गई।
सम्मेलन में कई प्रमुख मांगे रखी गईं, जिनमें शामिल हैं:
आदिवासियों की जनसंख्या के अनुपात में निजी क्षेत्र में भी आरक्षण सुनिश्चित करना।
सभी आरक्षित रिक्त पदों को तुरंत भरना।
आदिवासी शिक्षा के लिए बजट आवंटन बढ़ाना।
संविधान की 5वीं अनुसूची और पेसा कानून का प्रभावी क्रियान्वयन करना तथा आदिवासी अधिकारों को कमज़ोर करने वाले सरकारी निर्देशों को वापस लेना।
आदिवासी अधिकार राष्ट्रिय मंच के महासचिव डॉ पुलिन बिहारी बास्के
सम्मेलन के अंतिम चरण में संगठन के नेतृत्व ने आंदोलन को और व्यापक बनाने का आह्वान किया। महासचिव पुलिन बिहारी बास्के ने प्रतिनिधियों का स्वागत किया और जितेंद्र चौधरी ने सम्मेलन के मुख्य विषयों पर विचार रखे। अंत में वृंदा करात ने संथाली भाषा में आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन को और सशक्त बनाने का संदेश दिया।
संगठन की ओर से बताया गया कि इन मांगों को लेकर सोमवार को दिल्ली में प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। जल-जंगल-ज़मीन के अधिकार से लेकर शिक्षा और रोज़गार जैसे आदिवासी जीवन से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर और तेज़ करने का संकल्प दिल्ली सम्मेलन से लिया गया।
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 07 सितंबर 2026 • 4 मिनट पठन

प्रश्न करना /
राजद्रोह /
आंदोलन करना /
देशद्रोह /
हक़ मांगना /
राष्ट्रद्रोह /
बना दिया ।
इन सबके बावजूद /
लोग डर नहीं रहे /
छोटे-छोटे बच्चे /
खिलाफत को /
उतारू हैं ।
16 सितंबर 2026

मंगलवार दोपहर गड़वेता के अमलागोड़ा तिराहे पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने हथौड़े से लेनिन की मूर्ति तोड़ दी। उससे पहले शनिवार रात शालबनी में हमला हुआ था। शालबनी बाजार के पास सीपीआई(एम) का पुराना कार्यालय 'तुलसी भवन' है। सोमवार आधी रात को सबल और बड़े सीमेंट के खंभों से गेट तोड़कर बीजेपी कार्यकर्ता अंदर घुसे। उन्होंने टीवी, कंप्यूटर, रसोई गैस, पंखे समेत अन्य सामान लूट लिया। इसके बाद तोड़फोड़ करके आग लगा दी।
16 सितंबर 2026

हम तो /
नारी शक्ति के समक्ष /
नतमस्तक हैं ।
हम सभी /
एक स्त्री से ही तो /
जनमे हैं ।
उसी के संरक्षण में /
हमारा स्वर्णिम /
बालपन बीता है ।
12 सितंबर 2026

पेपर माफिया बेलगाम। जिम्मेदार कौन ?
नीट प्रश्नपत्र लीक के पीछे एक अत्यंत संगठित गिरोह होने की बात जांचकर्ता मान रहे है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्रश्नपत्र राजस्थान, हरियाणा, केरल, जम्मू- काश्मीर, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में फैल गया था पूरा काम अत्यंत संगठित तरीके से होता है । प्रश्नपत्र विभिन्न चरणों में अलग-अलग स्तरों पर बेचे जाते हैं ये सीधे छात्रों को नहीं बेचे जाते। प्रश्नपत्र बेचने के लिए अलग 'थोक' और 'खुदरा' बाजार होते हैं। किसी भी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक गिरोह में 100 करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन की संभावना है।
केशव कुमार भट्टड़ • 12 मई 2026

सीबीआई ने आरोपी की पहचान पीवी कुलकर्णी के रूप में की है। जांच में सामने आया है कि कुलकर्णी न केवल रसायन शास्त्र (Chemistry) के प्रोफेसर थे, बल्कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था 'एनटीए' के एक प्रभावशाली अधिकारी भी थे। इसी पद पर रहने के कारण प्रश्नपत्रों तक उनकी आसान पहुंच थी।
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'पहाड़' की ताकत 'पहाड़' के हाथों में क्यों नहीं?! अफसरों के दम पर स्वायत्तता का नाटक बंद करो!" स्वायत्तता छीने जाने पर गरजे मोहम्मद सलीम!" - दार्जिलिंग के कलामंदिर हॉल में आयोजित कार्यकर्ताओं की सभा में सीपीआई(एम) पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने भाजपा और आरएसएस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार स्वायत्त निकाय जीटीए (GTA) में प्रतिनिधियों के चुनाव कराने के बजाय प्रशासक बिठाकर लोकतंत्र और पहाड़ के अधिकारों का हनन कर रही है। कश्मीर से लद्दाख और दार्जिलिंग तक क्षेत्रीय स्वायत्तता को खत्म करने की साजिश का दावा करते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि भाजपा न तो बहुलतावाद को मानती है और न ही विविधता का सम्मान करती है। पार्टी ने घोषणा की कि वे संविधान की छठी अनुसूची, भूमि अधिकार, चाय बागान श्रमिकों की बदहाली, पर्यावरण विनाश और नागरिकता के नाम पर हो रहे भेदभाव के मुद्दों को लेकर अक्टूबर-नवंबर में पहाड़ की जनता के बीच एक व्यापक जन-अभियान चलाएंगे।
केशव कुमार भट्टड़ • 14 सितंबर 2026
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